MP High Court : इंदौर। इमरान हाशमी और यामी गौतम अभिनीत फिल्म ‘हक’ रिलीज होने से पहले ही विवादों के घेरे में फंस गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने बुधवार को इसकी याचिका पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया। याचिका शाह बानो के परिजनों ने दायर की थी। वे फिल्म पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं।
उनका कहना है कि यह फिल्म शाह बानो के जीवन पर आधारित है। लेकिन बिना सहमति बनाई गई। इससे परिवार की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंच रही है। जस्टिस प्रणव वर्मा की अदालत ने दोनों पक्षों के तर्क सुने। अब फैसला किसी भी समय आ सकता है।
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फिल्म में ऐसा क्या?
शाह बानो का नाम सुनते ही 1985 का ऐतिहासिक केस याद आ जाता है। उन्होंने अपने पति के तलाक के बाद गुजारा भत्ता मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ पर बहस छिड़ गई।
फिल्म ‘हक’ इसी मुद्दे को छूती है। तीन तलाक, गुजारा भत्ता और मुस्लिम महिलाओं के संघर्ष पर बनी यह कहानी कथित तौर पर शाह बानो की जिंदगी से प्रेरित है। इमरान हाशमी एक वकील की भूमिका में हैं। यामी गौतम पीड़ित महिला बनी हैं। फिल्म 8 नवंबर को रिलीज होनी है। लेकिन यह विवाद रुकने का नाम नहीं ले रहा।
परिजनों ने अदालत में शिकायत की। कहा कि फिल्म में शाह बानो के जीवन को गलत तरीके से दिखाया गया है। कोई अनुमति नहीं ली गई। इससे न सिर्फ शाह बानो की छवि खराब हो रही। बल्कि पूरे परिवार को बदनामी झेलनी पड़ रही है।
याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि फिल्म का प्रसारण रोका जाए। सेंसर बोर्ड की मंजूरी को भी चुनौती दी। उनका तर्क था कि बोर्ड ने संवेदनशील मुद्दों को नजरअंदाज कर दिया। परिवार के एक सदस्य ने कहा, “हमारी मां ने समाज के लिए लड़ाई लड़ी। लेकिन उनकी कहानी को तोड़-मरोड़कर पेश करना अन्याय है।”
कोर्ट ने पहली सुनवाई में ही फिल्म प्रोड्यूसर्स को नोटिस भेजा। जवाब मांगा। निर्माताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट अजय बगड़िया ने पक्ष रखा। उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘हक’ किसी खास व्यक्ति पर आधारित नहीं। यह न्यायिक फैसले और महिलाओं के संघर्ष की सामान्य कहानी है। बगड़िया ने तर्क दिया कि फिल्म सेंसर बोर्ड के कड़े परीक्षण से गुजरी। बोर्ड ने हर सीन को बारीकी से देखा। फिर रिलीज की अनुमति दी।
निर्माता का कहना है कि शाह बानो का नाम फिल्म में कहीं नहीं आता। यह सिर्फ प्रेरणा है। न कि बायोपिक। वकील ने अदालत को आश्वस्त किया कि फिल्म सत्य को नुकसान नहीं पहुंचाती। बल्कि सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता फैलाती है।
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने गर्मागर्म बहस की। परिजनों के वकील ने कहा कि बिना सहमति फिल्म बनाना निजता का उल्लंघन है। जबकि निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद 19 का हवाला दिया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार।
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जस्टिस वर्मा ने सवाल किए। पूछा कि क्या फिल्म में वास्तविक घटनाओं का इस्तेमाल हुआ। दोनों पक्षों ने दस्तावेज पेश किए। कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया। अब सस्पेंस बना हुआ है। फिल्म के डायरेक्टर ने कहा कि हमारा मकसद जागरूकता फैलाना है। न कि किसी को ठेस पहुंचाना।