SIR पर सियासी घमासान: 7 बार कांग्रेस के दौर में हुआ रिविजन, 9वें पर क्यों बढ़ा विवाद?
देश में SIR को लेकर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने हैं। कांग्रेस प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाता नामों पर असर को लेकर सवाल उठा रही है। बीजेपी पुराने SIR का हवाला दे रही है। इससे पहले 8 बार Intensive Revision हो चुका है, जिनमें 7 कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकारों के दौर में हुए।
9th SIR Sparks Political Row: देशभर में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर सियासी तापमान बढ़ा हुआ है। कांग्रेस इस प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग से सवाल कर रही है और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी आपत्ति जता रही है। दूसरी ओर, बीजेपी का कहना है कि मतदाता सूची को अपडेट और दुरुस्त रखना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
चुनाव आयोग के मुताबिक क्या है SIR?
SIR के जरिए मतदाता सूची की दोबारा गहन जांच की जाती है। इसका मकसद पात्र मतदाताओं को सूची में बनाए रखना, नए योग्य मतदाताओं को शामिल करना और मृत या स्थायी रूप से स्थान बदल चुके लोगों की प्रविष्टियों को अपडेट करना है। चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक शक्तियों और संबंधित चुनाव कानूनों के तहत इस तरह की प्रक्रिया संचालित करता है।
देश में पहले कितनी बार हुआ SIR?
बता दें, SIR कोई नई प्रक्रिया नहीं है। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक देश में इससे पहले 8 बार Intensive Revision हो चुका है। इनमें से सात प्रक्रियाएं कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकारों के दौर में हुईं।
- 1952-56: जवाहरलाल नेहरू सरकार
- 1957-61: जवाहरलाल नेहरू सरकार
- 1965-66: लाल बहादुर शास्त्री सरकार
- 1983-84: इंदिरा गांधी सरकार
- 1987-89: राजीव गांधी सरकार
- 1992-93: पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार
- 1995: पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार
- 2002-04: अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में प्रक्रिया शुरू हुई और 2004 में मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान पूरी हुई।
इस इतिहास का हवाला देते हुए बीजेपी मौजूदा SIR को लेकर कांग्रेस के विरोध पर सवाल उठा रही है। हालांकि, मौजूदा विवाद का केंद्र सिर्फ यह नहीं है कि पहले SIR कब हुए, बल्कि प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े सवाल भी हैं।
कांग्रेस की मुख्य आपत्तियां क्या हैं?
मामले के लेकर कांग्रेस का कहना है कि SIR के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित होने की स्थिति पैदा हो सकती है। पार्टी ने दस्तावेजों की जरूरत, नाम हटाने की प्रक्रिया और पूरी कवायद में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका और चुनाव आयोग के फैसले लेने के तरीके पर भी आपत्ति जताई है।
