Dindori Water Conservation : डिंडौरी। मध्य प्रदेश का डिंडौरी जिला इन दिनों कुछ ऐसी ही वजह से चर्चा में है जहां लोगों ने पानी बचाने को सिर्फ सरकारी योजना नहीं माना बल्कि खुद आगे आकर इसे जनभागीदारी का अभियान बना दिया।
नतीजा ये हुआ कि डिंडौरी जिला जल संरचनाओं के निर्माण और पुराने तालाबों व पानी के स्रोतों को फिर से तैयार करने के मामले में देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया। पिछले दो महीनों से यहां जनभागीदारी के जरिए लगातार काम किया जा रहा है और अब तक जिले और जनपद पंचायत क्षेत्रों में कुल 6 लाख 26 हजार 955 जल संरचनाएं बनाई जा चुकी हैं।
गांवों में जमीनी स्तर पर बदलाव
बजाग जनपद पंचायत की सिंहपुर ग्राम पंचायत में करीब साढ़े तीन सौ घर हैं और लगभग हर घर में सोखता पिट बनाया गया है। साथ ही छतों से बारिश के पानी को पाइप के जरिए जमीन में पहुंचाने की तैयारी की गई है।
गांव की रहने वाली मेकिन बाई बताती हैं कि पहले उन्हें जल संरक्षण के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी लेकिन सरपंच दीपचंद पूषाम और अधिकारियों ने उन्हें समझाया कि अगर पानी को रोका नहीं गया तो आने वाले समय में संकट और बढ़ेगा। इसके बाद उन्होंने खुद मेहनत करके पाइप खरीदे और अपने घर के सामने सोखता पिट बनवाया।
जमुना खैरवार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वे कहती हैं कि पहले उन्हें लगता था कि पानी उपलब्ध कराना सिर्फ सरकार और अधिकारियों की जिम्मेदारी है लेकिन जब उन्हें समझाया गया कि छोटी-सी कोशिश से धरती को रिचार्ज किया जा सकता है तो उन्होंने अपने घर में दो सोखता पिट बनवाए। अब वे खुद गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक कर रही हैं।
जल संरक्षण के साथ उपयोग पर भी जोर
आजीविका परियोजना से जुड़ी कृषक सखी सुदामा सुरेश्वर बताती हैं कि ‘मां की बगिया’ योजना के तहत पांच लोगों के यहां बगिया तैयार की गई है जहां 15 नींबू और 35 आम के पौधे लगाए गए हैं। इन पौधों को ड्रिप इरिगेशन, हांडी और स्लाइन की बोतलों के जरिए पानी दिया जा रहा है ताकि कम पानी में ज्यादा पौधे जीवित रह सकें।
तालाब और जल संरचनाओं का पुनर्निर्माण
गांव के सरपंच और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यहां पहले से चार तालाब और 12 स्टॉप डैम मौजूद थे लेकिन लोगों की भागीदारी से उन्हें फिर से ठीक किया गया। इसके अलावा करीब साढ़े तीन सौ कंटूर ट्रेंच भी बनाए गए हैं ताकि बारिश का पानी बहकर न जाए और जमीन के भीतर समा सके।
अमरपुर जनपद के भाखा मॉल ग्राम पंचायत में भी तस्वीर बदल रही है जहां लगभग 928 घर हैं। ग्रामीण खुद अपने खर्च पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग और जल संरक्षण से जुड़ी संरचनाएं बना रहे हैं। 55 ग्रामीणों ने सोखता गड्ढे बनाए, 262 कंटूर ट्रेंच तैयार किए, 8 तालाबों की मरम्मत की और कई परिवार ड्रिप इरिगेशन का उपयोग कर रहे हैं।
प्रशासनिक पहल और जागरूकता अभियान
असिस्टेंट इंजीनियर प्रियंका के अनुसार शुरुआत में लोगों को समझाना आसान नहीं था लेकिन चौपालों और बैठकों के जरिए ग्रामीणों को पानी का महत्व समझाया गया। अब लोग खुद आगे आकर काम कर रहे हैं।
डिंडौरी कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया के मुताबिक जिले की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि पानी को बचाना चुनौतीपूर्ण है। यहां पठारी इलाका है और सिंचाई योग्य भूमि केवल करीब 17 प्रतिशत है। इसी वजह से गांव-गांव चौपाल और जागरूकता अभियान चलाए गए, जिसका असर अब दिख रहा है। हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। एक तरफ बड़े स्तर पर जल संरचनाएं बनाई जा रही हैं तो दूसरी तरफ कई गांव आज भी जल संकट से जूझ रहे हैं।
जिला मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर स्थित आवास टोला में महिलाएं अब भी डेढ़ किलोमीटर दूर जाकर पानी लाने को मजबूर हैं। कई जगह नल-जल योजनाएं अधूरी पड़ी हैं और लोग कुओं पर निर्भर हैं।
क्या है विशेषज्ञों की राय
भूगोल विशेषज्ञ डॉ. रश्मि गौतम का कहना है कि छोटी जल संरचनाएं भूजल रिचार्ज में मदद करती हैं, लेकिन स्थायी समाधान के लिए बड़े जल प्रबंधन ढांचे की भी जरूरत है। डिंडौरी में चल रहा यह अभियान जनभागीदारी की एक मजबूत मिसाल बनकर उभरा है। हालांकि असली चुनौती अभी भी हर घर तक स्थायी और सुरक्षित जल आपूर्ति सुनिश्चित करना है।