Gwalior High Court verdict : ग्वालियर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, अल्पसंख्यक संस्थान खुद चुनेंगे प्राचार्य, सीनियरिटी नियम बाध्यकारी नहीं

Gwalior High Court verdict

Gwalior High Court verdict : ग्वालियर।  मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर स्थित युगल पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को अपने प्राचार्य या प्रभारी प्राचार्य के चयन का पूर्ण अधिकार है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार इन संस्थानों पर वरिष्ठता (सीनियरिटी) आधारित नियम थोप नहीं सकती।

प्राचार्य चयन में संस्थान की स्वतंत्रता जरूरी

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि किसी भी शिक्षण संस्थान में प्राचार्य की भूमिका बेहद अहम होती है। वह अनुशासन, प्रशासन और शिक्षा की गुणवत्ता तय करता है। ऐसे में संस्थान को यह अधिकार होना चाहिए कि वह योग्यता और आवश्यकता के आधार पर नेतृत्व चुने, भले ही चयनित व्यक्ति वरिष्ठतम न हो।

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सरकारी सर्कुलर आंशिक रूप से निरस्त

कोर्ट ने 25 अगस्त 2021 और 8 सितंबर 2021 को जारी सरकारी सर्कुलरों को अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू करने के मामले में निरस्त कर दिया।

इन सर्कुलरों में वरिष्ठतम शिक्षक को प्रभारी प्राचार्य बनाने का प्रावधान था, जिसे कोर्ट ने असंवैधानिक दखल मानते हुए खारिज कर दिया।

चयन के बाद हस्तक्षेप नहीं

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि एक बार प्रबंधन समिति द्वारा किसी योग्य व्यक्ति का चयन कर लिया जाता है, तो उसकी उपयुक्तता में सरकार या न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

विदिशा से शुरू हुआ मामला

यह पूरा मामला विदिशा स्थित एसएसएल जैन पीजी कॉलेज से जुड़ा है। कॉलेज की प्रभारी प्राचार्य डॉ. शोभा जैन के सेवानिवृत्त होने के बाद प्रबंधन ने डॉ. एसके उपाध्याय को प्रभारी प्राचार्य नियुक्त किया था। लेकिन क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालक ने इस फैसले को रद्द करते हुए वरिष्ठता के आधार पर डॉ. अर्चना जैन को नियुक्त करने का आदेश दिया।

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सिंगल बेंच का फैसला पलटा

प्रबंधन ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। शुरुआत में सिंगल बेंच ने सरकार के पक्ष में फैसला दिया था, लेकिन अब युगल पीठ ने उस आदेश को पलटते हुए प्रबंधन के अधिकार को सही ठहराया है।

यह फैसला अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता को मजबूत करता है और भविष्य में ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।

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