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Raisen News : छात्रा को स्कूल में एक चोटी बनाने की मिली सजा, महिला टीचर ने एक घंटे तक धूप में खड़ा रखा; छात्रा बेहोश

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Raisen School Ponytail Punishment Incident : रायसेन। मध्य प्रदेश की धरती पर शिक्षा का एक ऐसा चेहरा सामने आया है, जो दिल दहला देने वाला है।एक छात्रा स्कूल जाती है, लेकिन सिर्फ अपनी चोटी की वजह से उसे ऐसी सजा मिलती है कि उसकी जान पर बन जाती है। रायसेन जिले के सुल्तानगंज में बुधवार को यह घटना हुई है। इसके बाद परिवार समेत अन्य अभिभावकों ने विद्यालय पर सवाल उठाये हैं।

यह घटना सुल्तानगंज के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की है, जहां कक्षा नौवीं की छात्रा आरोही रोज की तरह स्कूल पहुंची। आरोही पिपलिया बिचौली गांव की निवासी है और उसके पिता देवीसिंह किसान हैं। वह चोटी बनाकर आई थी, जो शायद स्कूल की यूनिफॉर्म कोड के खिलाफ मानी गई। इसी पर महिला शिक्षिका रचना साहू ने गुस्सा दिखाया और छात्रा को क्लासरूम के बाहर, तेज धूप वाली जगह पर खड़ा कर दिया।

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धूप इतनी प्रचंड थी कि करीब एक घंटे तक खड़े रहने से आरोही की हालत खराब होने लगी। अचानक वह चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ी और बेहोश हो गई। स्कूल के स्टाफ ने फौरन उसे उठाया और नजदीकी सुल्तानगंज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए। वहां डॉक्टरों ने प्राथमिक इलाज किया, लेकिन हालत गंभीर देखते हुए उसे सागर के बड़े अस्पताल रेफर कर दिया गया।

परिवार वाले सदमे में हैं। देवीसिंह ने बताया कि उनकी बेटी पहले से ही दमा की मरीज है, लेकिन इतनी गर्मी में सजा देना क्रूरता ही तो है। स्कूल का यह व्यवहार नया नहीं है। कुछ ही दिनों पहले ग्रामीणों ने प्राचार्य और शिक्षकों के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया था।

उन्होंने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा, जिसमें स्कूल की खराब व्यवस्था और शिक्षकों के रवैये की शिकायत की गई थी। अब यह नया मामला सामने आते ही पुरानी बातें फिर ताजा हो गई हैं। जिला शिक्षा अधिकारी ने जांच के आदेश दे दिए हैं, लेकिन आरोही की सेहत अभी चिंताजनक बनी हुई है।

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स्कूल के प्राचार्य राकेश कुमार सोनी ने इस मामले में सफाई दी है। उनका कहना है कि छात्रा को धूप में जानबूझकर नहीं खड़ा किया गया था। बल्कि, आरोही पहले से बीमार थी और क्लासरूम के बाहर थोड़ी देर खड़े रहने से उसकी दमा की समस्या बढ़ गई। लेकिन ग्रामीण और परिवार वाले इस बयान को सिरे से खारिज कर रहे हैं।

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वे कहते हैं कि सजा का तरीका गलत था और इससे बचाव के कोई इंतजाम नहीं किए गए। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि स्कूल सुरक्षित जगह होने चाहिए, न कि सजा के अड्डे। क्या यूनिफॉर्म कोड इतना सख्त होना चाहिए कि छात्रों की सेहत दांव पर लग जाए?

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