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Nilesh Adivasi Suicide Case : मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को सुप्रीम कोर्ट से राहत, नीलेश आदिवासी मौत मामले में SIT गठन

Minister Govind Singh Rajput arrest has been stayed

Nilesh Adivasi Suicide Case : भोपाल। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के 27 साल के नीलेश आदिवासी की संदिग्ध मौत के मामले में गुरुवार को बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने इस मौत की निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठन का आदेश दिया और साथ ही प्रदेश के मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत भी दे दी।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने मध्य प्रदेश के डीजीपी को दो दिन के अंदर तीन सदस्यीय SIT बनाने को कहा। खास बात यह है कि SIT में मध्य प्रदेश से बाहर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल होंगे ताकि स्थानीय दबाव या प्रभाव से जांच बची रहे।

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SIT में होंगे ये अफसर:
1. एक सीधे भर्ती वरिष्ठ IPS (मध्य प्रदेश से बाहर का)
2. एक युवा IPS अफसर (राज्य से बाहर का)
3. DSP रैंक की महिला अफसर

कोर्ट ने साफ कहा कि SIT को एक महीने में जांच पूरी कर रिपोर्ट देनी है। जांच में मौत के हर पहलू को देखा जाए, भले ही वो मौजूदा पुलिस जांच में शामिल न हों।

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वहीं, नीलेश की मौत के बाद दर्ज SC/ST एक्ट के केस में मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने कहा, “अभी गिरफ्तारी पर रोक रहेगी। अगर SIT को कोई ठोस सबूत मिलता है तो वो कोर्ट से अनुमति लेकर पूछताछ कर सकती है।” कोर्ट ने नीलेश के भाई को भी जांच के दौरान सुरक्षा देने का आदेश दिया।

क्या है पूरा मामला?

  • 1 जुलाई 2025 को नीलेश आदिवासी ने मंत्री गोविंद सिंह राजपूत पर जातिसूचक गाली देने का SC/ST एक्ट में केस दर्ज कराया था।
  • कुछ दिन बाद नीलेश ने SP और मजिस्ट्रेट के सामने हलफनामा दिया कि शिकायत झूठी थी, नशे में लिखवाई गई थी और उसे एक स्थानीय नेता के लोगों ने दबाव डालकर करवाई थी।
  • 25 जुलाई को नीलेश ने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
  • पत्नी ने तीन अलग-अलग शिकायतें दीं, लेकिन किसी में भी गोविंद सिंह राजपूत का नाम नहीं था।
  • फिर भी 4 सितंबर 2025 को पुलिस ने मंत्री पर आत्महत्या के लिए उकसाने और SC/ST एक्ट की धाराएं लगाकर केस दर्ज कर लिया।
  • ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत खारिज कर दी, जिसके बाद मंत्री सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

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कोर्ट ने कहा कि बयानों में विरोधाभास है, इसलिए निष्पक्ष जांच जरूरी है। गवाहों (खासकर आदिवासी समुदाय के) पर किसी तरह का दबाव न डाला जाए। मंत्री की तरफ से पैरवी करने वाली वकील तान्या अग्रवाल ने दलील दी थी कि केस राजनीतिक बदले की भावना से दर्ज हुआ है और प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

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