Vidisha Vijay Mandir Controversy : विदिशा। मध्य प्रदेश के विदिशा शहर के किले के अंदर बसा बीजामंडल, जिसे विजय मंदिर के नाम से जाना जाता है, आज फिर सुर्खियों में है। स्थानीय हिंदू संगठनों और भक्तों की लंबी लड़ाई को ग्वालियर हाईकोर्ट ने स्वीकार किया है। याचिका दाखिल होते ही कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से जवाब मांगा है।
याचिका में दावा किया गया है कि, ये मंदिर परमार वंश की भव्य विरासत का गवाह है, जो कभी देश के विशालतम मंदिरों में शुमार था। लेकिन इतिहास की मारों ने इसे बीजा मंडल मस्जिद के रूप में बदल दिया।
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विदिशा निवासी शुभम वर्मा ने रविवार को बताया कि 20 अगस्त 2025 को ग्वालियर हाईकोर्ट में पांच याचिकाकर्ताओं की ओर से याचिका दायर की गई थी। कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया है, और 8 सितंबर को स्वीकृति का पत्र भी प्राप्त हो गया। याचिका की पैरवी कर रहे अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने पुष्टि की कि कोर्ट ने ASI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
याचिकाकर्ताओं में प्रथम नाम हरिशंकर जैन का है, जो एक अधिवक्ता हैं और अयोध्या राम मंदिर केस में भी याचिकाकर्ता रह चुके हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर विवाद में भी उनका नाम प्रमुखता से जुड़ा है। शुभम वर्मा द्वितीय याचिकाकर्ता हैं, जबकि राकेश, मनी और राहुल अन्य सदस्य हैं। ये समूह दावा करता है कि बीजामंडल मूल रूप से विजय मंदिर है और इसे उसी रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
मांग साफ है – मंदिर के आगे “मंदिर” लिखा जाए और पूजा-अर्चना के लिए रोजाना गेट खोला जाए। शुभम वर्मा ने बताया कि पिछले एक वर्ष से वे इस मुद्दे पर गहन अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने 118 पेज की विस्तृत याचिका में साक्ष्य पेश किए हैं। दावा है कि 1962 में मंदिर को तोड़ा गया था। कई वर्षों तक इसमें देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित थीं, जो अब संग्रहालय में रखी गई हैं।
शुभम ने कई बार कलेक्टर को ज्ञापन सौंपे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने कहा “हमें न्यायालय की शरण लेनी पड़ी, क्योंकि प्रशासन ने सुनवाई नहीं की”। ये मांग कोई नई नहीं; वर्षों से हिंदू संगठन नाग पंचमी पर बंद ताले के बाहर पूजा करने को मजबूर हैं। 2024 में भी 9 अगस्त को नाग पंचमी पर ताला खोलने की मांग उठी थी, लेकिन ASI ने इंकार कर दिया।
रिपोर्ट्स के अनुसार, ये मंदिर 11वीं शताब्दी में परमार राजा जयसिंह द्वितीय द्वारा बनवाया गया था। इसका नाम विजयगढ़ किले के कारण पड़ा और विदिशा का प्राचीन नाम भेलसा इसी से जुड़ा। ये 1 किलोमीटर लंबा और 300 फीट ऊंचा विशालकाय मंदिर था, जिसका डिजाइन राम मंदिर और नए संसद भवन से मिलता-जुलता है। लेकिन 1459-60 में मांडू के शासक महमूद खिलजी ने इसे लूटा, और 1532 में गुजरात के बहादुर शाह ने पुनर्विनाश किया। बाद में औरंगजेब काल में इसे मस्जिद में बदला गया।
1760 में पेशवा बाजीराव ने मस्जिद स्वरूप नष्ट किया, लेकिन 1992 की बाढ़ ने बाकी हिस्से को प्रभावित किया। ASI इसे 1951 के गजेट नोटिफिकेशन के तहत बीजामंडल मस्जिद मानता है, जिससे विवाद बढ़ा। अगस्त 2024 में जब हिंदू संगठनों ने पूजा की अनुमति मांगी, तो ASI ने मस्जिद बताते हुए इनकार किया। ये घटना भोजशाला विवाद की याद दिलाती है, जहां धार्मिक स्थलों पर मालिकाना हक का सवाल उठता रहता है।