सुप्रीम कोर्ट में एक साथ 9 मुद्दों पर सुनवाई, CJI बोले- प्रदर्शन का अधिकार सभी को है, किसी एक संगठन का नहीं हो सकता सार्वजनिक स्थल पर स्थायी कब्जा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी संगठन सार्वजनिक जगह पर अनिश्चितकाल तक धरना नहीं दे सकता। CJI सूर्यकांत ने कहा कि प्रदर्शन का अधिकार सभी को है। सुनवाई में दिल्ली के कारोबारियों ने 2,000 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा किया, जबकि पुलिस कार्रवाई और निगरानी पर भी सवाल उठे।


Supreme Court on Protests: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सार्वजनिक जगहों पर लंबे समय तक धरना जारी रखने को लेकर अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि कोई भी संगठन किसी सार्वजनिक स्थान पर अनिश्चितकाल तक कब्जा करके प्रदर्शन नहीं कर सकता। प्रदर्शन के लिए तय जगहों पर भी समय-सीमा होनी चाहिए, ताकि दूसरे समूहों को अपनी बात रखने का अवसर मिल सके। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच दिल्ली में अक्टूबर के दौरान हुए प्रदर्शनों से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
'प्रदर्शन का अधिकार सभी को, एक जगह पर हमेशा कब्जा नहीं'
बता दें, सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि कोई भी समूह किसी जगह पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि एक संगठन लंबे समय तक किसी स्थान पर बैठा रहेगा, तो किसान, पत्रकार, मजदूर और दूसरे प्रदर्शनकारी अपनी बात रखने के लिए कहां जाएंगे?
कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य जोर इस बात पर था कि प्रदर्शन का अधिकार सभी को है, इसलिए सार्वजनिक स्थलों का इस्तेमाल इस तरह होना चाहिए कि दूसरे लोगों और समूहों के अधिकार भी प्रभावित न हों।
व्यापारियों ने 2,000 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा किया
दिल्ली के व्यापारिक संगठनों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि प्रदर्शनों के कारण बाजार और कारोबार प्रभावित हुए। त्योहारों के समय कई दुकानें बंद रहीं और बिक्री पर असर पड़ा।
रोहतगी ने दावा किया कि कारोबारियों को करीब 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। उन्होंने अदालत से अगले दो महीने तक धरने और प्रदर्शनों पर रोक लगाने की मांग भी की। यह नुकसान व्यापारिक संगठनों की ओर से पेश किया गया दावा है।
CJP को एक दिन की अनुमति, लेकिन 17 दिन तक चला प्रदर्शन
जानकारी के अनुसार, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दिल्ली पुलिस की ओर से दलील देते हुए कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए केवल एक दिन की अनुमति दी गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी 17 दिनों तक वहां बैठे रहे।
मेहता ने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों ने बिना अनुमति संसद की ओर मार्च किया। संसद देश की संप्रभुता का प्रतीक है और वहां तक मार्च करने के लिए निर्धारित नियमों का पालन जरूरी है। उन्होंने दलील दी कि बंद या प्रदर्शन का आह्वान करने वाले संगठनों को उससे होने वाले प्रभावों की जिम्मेदारी भी समझनी चाहिए।
हिरासत और पुलिस कार्रवाई पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने करीब 7 हजार लोगों को हिरासत में लिए जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों के खिलाफ की गई कार्रवाई का लोकतांत्रिक अधिकारों पर क्या असर पड़ता है।
इस पर तुषार मेहता ने कहा कि इन लोगों को हिरासत में नहीं लिया गया था, बल्कि प्रदर्शन स्थल से हटाया गया था। इस तरह अदालत में पुलिस कार्रवाई को लेकर दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं।
प्रदर्शनकारियों की निगरानी पर भी बहस
साथ ही, वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सवाल उठाया कि प्रदर्शनकारियों पर किस कानूनी प्रावधान के तहत निगरानी की जा रही थी। उन्होंने सरकार से इस निगरानी का आधार स्पष्ट करने को कहा।
जवाब में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान केवल CCTV कैमरों के जरिए निगरानी की गई। उन्होंने यह भी दलील दी कि कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर प्रदर्शन की लाइव रिकॉर्डिंग कर रहे थे, ऐसे में सरकारी CCTV निगरानी पर सवाल उठाना उचित नहीं है।
इन 9 मुद्दों पर एक साथ सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शन से जुड़े नौ प्रमुख मुद्दे रखे गए हैं-
- मेट्रो और ट्रेन सेवाएं: प्रदर्शन के दौरान मेट्रो स्टेशन बंद करने और दिल्ली आने-जाने वाली ट्रेनों पर पाबंदियां लगाने के फैसले को चुनौती दी गई है।
- अदालती आदेश की अवमानना: याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि 9 अक्टूबर को मेट्रो और ट्रेन सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं करने के निर्देश का पालन नहीं हुआ।
- प्रदर्शनकारियों को हटाने की कार्रवाई: 10 अक्टूबर को बड़ी संख्या में लोगों को प्रदर्शन स्थल से हटाए जाने और हिरासत में लिए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
- वकीलों के साथ कथित मारपीट: वकीलों को हिरासत में लेने और पुलिस स्टेशन में उनके साथ मारपीट किए जाने के आरोपों से जुड़ी याचिकाएं भी सुनवाई में शामिल हैं।
- जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति: याचिकाकर्ताओं ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने के फैसले को चुनौती दी है और वहां दोबारा प्रदर्शन की अनुमति देने की मांग की है।
- BNSS की धारा 163 के तहत पाबंदियां: दिल्ली में निषेधाज्ञा लागू करने के आधार और उसके इस्तेमाल पर सवाल उठाए गए हैं। कोर्ट ने संबंधित आदेशों की प्रतियां पेश करने को कहा है।
- सड़कों पर बैरिकेडिंग: प्रदर्शन के दौरान रास्ते बंद करने, आवाजाही रोकने और पुलिस की ओर से लगाई गई पाबंदियों को चुनौती दी गई है।
- पहले के आदेशों का पालन: याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि 11 अक्टूबर को शांतिपूर्ण प्रदर्शन, मेट्रो, ट्रेन और इंटरनेट सेवाओं को लेकर दिए गए निर्देशों का पालन नहीं किया गया।
- व्यापारियों को हुए नुकसान का मुद्दा: व्यापारिक संगठनों ने प्रदर्शनों के कारण कारोबार प्रभावित होने और आर्थिक नुकसान का हवाला देते हुए याचिका दायर की है।
इस सुनवाई में अदालत के सामने प्रदर्शन करने के अधिकार, सार्वजनिक जगहों के इस्तेमाल, आम लोगों की आवाजाही और कारोबार पर पड़ने वाले असर जैसे मुद्दे आए। अलग-अलग पक्षों ने अपने तर्क रखे और कोर्ट ने इन सभी पहलुओं पर सुनवाई की।
