‘सरकारी डॉक्टर खतरनाक होते हैं’ बताने वाले नक्सलियों से कैसे मुक्त हुआ बालाघाट
बालाघाट में नक्सलवाद से प्रभावित रहे आदिवासियों को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने की कोशिश तेज है। 36 साल के नक्सली प्रभाव के बाद सरकारी कर्मचारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की टीम भरोसा कायम कर रही है।
मध्यप्रदेश के बालाघाट में लंबे समय तक नक्सली प्रभाव झेल चुके आदिवासी इलाकों में अब सुरक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास की सुविधाएं पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है। कभी नक्सलियों के प्रभाव के कारण सरकारी सेवाओं से दूर रहे लोगों को अब अस्पतालों और प्रशासनिक सुविधाओं से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी इन क्षेत्रों के विकास के लिए ₹225 करोड़ के विशेष पैकेज की घोषणा की है।
मध्य प्रदेश तक नक्सलवाद की पहुंच और शुरुआत
सबसे पहले पहले 1980 के दशक में आंध्र प्रदेश और गढ़चिरौली (महाराष्ट्र) में जब भारत के सिपाहियों ने नक्सलवादियों के 'पीपुल्स वार ग्रुप' (PWG) पर चारों तरफ से हमला किया तो जान बचाने के लिए यह लोग पहली बार बालाघाट मध्य प्रदेश के जंगलों में आए थे। तब पहली बार नक्सलवादियों को बालाघाट के जंगलों की जानकारी मिली। वह लंबे समय तक यहां छुपे रहे और फिर वापस चले गए। मध्य प्रदेश में नक्सलियों की मौजूदगी की पहली घटना 5 जनवरी 1990 में दर्ज की गई थी। महाराष्ट्र के गोंदिया से अदारी गाँव होते हुए नक्सलवादी पहली बार मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में मुरकुटा गांव पहुंचे। यहां नक्सलवादियों ने बैगा/गोंड बहुल इलाकों में जनाधार बनाना शुरू किया, क्योंकि प्राकृतिक जीवन पद्धति के कारण बैगा/गोंड, अन्य आदिवासियों से अलग जंगल के अंदर रहा करते थे।
नक्सलवाद का मतलब क्या है?
नक्सलवाद का मतलब था, जंगल के एक खास इलाके पर कब्जा करना और उसमें रहने वाले आदिवासियों को अपना गुलाम बना लेना। 36 साल तक नक्सलवादियों ने बालाघाट के लांजी, पारसवाड़ा, बिरसा, रूपझर और गढ़ी के घने जंगल में रहने वाले आदिवासियों को कभी शहर नहीं आने दिया, उनके बच्चों को पढ़ने नहीं दिया, बीमार हुए तो अस्पताल नहीं जाने दिया। यदि किसी ने नक्सलवादियों के नियमों का उल्लंघन किया तो उसको कठोर दंड दिए गए। किसी के हाथ पैर काट दिए, किसी की आंख फोड़ दी, और केवल शक के आधार पर मौत की सजा दे दी जाती थी।
मंत्री की हत्या ने दिखाया नक्सली खतरे का असर
बालाघाट में नक्सली प्रभाव की गंभीरता का अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है कि 15 नवंबर 1999 को नक्सलियों ने मध्य प्रदेश के तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखीराम कांवरे को उनके घर से बाहर निकाल कर सबके सामने मार डाला। दिग्विजय सिंह उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे।
साल 2000 में बनी ‘हॉक फोर्स’
मध्यप्रदेश पुलिस ने वर्ष 2000 में ‘हॉक फोर्स’ नाम से विशेष एंटी-नक्सल यूनिट का गठन किया। जंगलों में नक्सलवादियों की तलाश में जंगल में कैंप करने वाले भारत के सैकड़ो सिपाही बीमारियों और जहरीले जानवरों के काटने से मर गए।
केंद्र और राज्य के अभियान से बदली स्थिति
नक्सलवाद के खिलाफ केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त रणनीति के तहत विशेष अभियान चलाए गए। वर्ष 2024 और 2025 में चलाए गए अभियानों के बाद बालाघाट में नक्सली प्रभाव कमजोर हुआ। इसके बाद 11 दिसंबर 2025 को बालाघाट को आधिकारिक रूप से नक्सली मुक्त क्षेत्र घोषित किया गया।
अब सुरक्षा के साथ विकास पर फोकस
नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में अब चुनौती केवल सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं है। प्रशासन के सामने उन परिवारों को सरकारी स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरी मूलभूत सुविधाओं से जोड़ने की भी जिम्मेदारी है, जो वर्षों तक मुख्यधारा से दूर रहे।
सरकारी कर्मचारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की टीम ग्रामीणों के बीच पहुंचकर उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति भरोसा दिलाने और अस्पताल तक लाने का काम कर रही है।
CM मोहन यादव ने घोषित किया ₹225 करोड़ का पैकेज
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बालाघाट के लिए ₹225 करोड़ के विशेष पैकेज की घोषणा की। इससे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों और सरकारी सुविधाओं की पहुंच को मजबूत करने की दिशा में सरकार की प्राथमिकता सामने आती है।
अब प्रशासन के सामने इस पैकेज के जरिए प्रभावित इलाकों में विकास की गति बढ़ाने और लोगों को मुख्यधारा की सुविधाओं से जोड़ने की चुनौती है।
‘सरकारी डॉक्टर खतरनाक हैं’ जैसी धारणा बदलना बड़ी चुनौती
लंबे समय तक नक्सली प्रभाव में रहने के कारण कुछ आदिवासी परिवारों में सरकारी डॉक्टरों और अस्पतालों को लेकर डर की धारणा बनी हुई है। ऐसे परिवारों को समझाकर इलाज के लिए अस्पताल लाना प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। 11 दिसंबर 2025 से 7 सितंबर 2026 तक करीब 9 महीने का समय ही बीता है। ऐसे में प्रशासन और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सामने लोगों का भरोसा मजबूत करने और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने का काम लगातार जारी है।
विकास की आलोचना हो, लेकिन दहशत न फैले
सरकार के ₹225 करोड़ के पैकेज, विकास कार्यों और नीतियों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन सोशल मीडिया पर ऐसे बयान या वीडियो, जिनसे आदिवासी समुदाय में सरकारी अस्पतालों और डॉक्टरों को लेकर दोबारा डर पैदा हो, उनसे बचने की जरूरत है।


