MP News : हरदा। मध्य प्रदेश के हरदा जिले में स्वच्छ भारत मिशन की चमक फीकी पड़ गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच रोकने के लिए 9 करोड़ 10 लाख रुपये खर्च कर बने 277 सामुदायिक स्वच्छता परिसर आज ताले लगे शोपीस बन चुके हैं। निर्माण के बाद से इनका उपयोग ही नहीं हो पाया। वजह साफ है- ताले खुले ही नहीं। ग्रामीणों को राहत देने का सपना अधूरा रह गया। जिले के जनपदों में बिखरे ये परिसर धूल खा रहे हैं।
यह योजना ग्राम पंचायतों की मांग पर शुरू हुई थी। उद्देश्य था गांवों में साफ-सफाई बढ़ाना लेकिन जगह और उपयोगिता पर कोई प्लानिंग नहीं हुई। कुल 277 परिसरों में से 185 को 3 लाख 43 हजार रुपये प्रति यूनिट की दर से बनाया गया। इसकी कुल लागत 6 करोड़ 34 लाख रुपये पड़ी। बाकी 92 परिसर 3 लाख रुपये प्रति यूनिट में बने। इन पर 2 करोड़ 76 लाख रुपये खर्च हुए लेकिन अब ये सिर्फ दिखावे के लिए खड़े हैं।
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एक किसान रामलाल ने कहा, “मुख्य सड़क पर यह परिसर है। राहगीरों को बहुत जरूरत है। लेकिन ताला लटक रहा है। साल भर से बंद है।” पास ही की महिलाओं ने जोड़ा, “बच्चों को ले जाना मुश्किल होता। खुले में जाना पड़ता है। ताला खोल दो तो गांव में स्वच्छता आए।” सिरकम्बा गांव में भी यही हाल। ग्रामीणों ने बताया, “निर्माण के समय तो जश्न हुआ। लेकिन अब ताले जंग खा रहे। कोई देखभाल नहीं।”
यह समस्या सिर्फ हरदा तक सीमित नहीं। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, सिद्धार्थनगर, मीरजापुर और हरदोई जैसे जिलों में भी स्वच्छ भारत मिशन के तहत बने शौचालय अनुपयोगी पड़े हैं। वहां भी ताले लगे हैं। पानी-बिजली की कमी है। ग्रामीण खुले में शौच को मजबूर। मध्य प्रदेश में हरदा इसका नया उदाहरण है।
स्वच्छ भारत अभियान के प्रभारी अधिकारी रजनीश शुक्ला ने समस्या मानी। उन्होंने कहा, “मेंटेनेंस बड़ी दिक्कत है। ग्रामीण क्षेत्रों में शुल्क नहीं मिलता। लोग पैसे देने से कतराते इसलिए परिसर बंद रहते। शहरी इलाकों में यह काम करता।”
प्रभारी अधिकारी शुक्ला ने कहा, “सार्वजनिक आयोजनों पर तो इन्हें खोल देते लेकिन रोजाना संभव नहीं। फंडिंग और जागरूकता बढ़ानी होगी।” उनका यह बयान बताता है कि योजना की कमजोरी साफ-सफाई में नहीं। बल्कि फंड मैनेजमेंट में है।
जिला प्रशासन ने कहा कि जल्द सर्वे होगा लेकिन वादे पुराने हैं। स्वच्छ भारत मिशन 2014 से चल रहा। अब 2025 में भी यही हाल है। केंद्र सरकार का लक्ष्य ओपन डिफिकेशन फ्री था लेकिन ग्रामीण इलाकों में असफलता साफ दिख रही। एनजीओ ने अपील की कि लोकल पार्टिसिपेशन बढ़े। ग्रामीणों को ट्रेनिंग दो। तभी ये परिसर काम आएंगे।