विनोद कुमार को श्रद्धांजलि: शिवराज समेत कई वरिष्ठजन सभा में पहुंचे
RSS प्रचारक विनोद कुमार की श्रद्धांजलि सभा शुक्रवार को हुई। शिवराज सिंह चौहान और कप्तान सिंह सोलंकी समेत कई लोग शामिल रहे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ प्रचारक विनोद कुमार के निधन के बाद शुक्रवार को श्रद्धांजलि सभा रखी गई। संघ के अखिल भारतीय सह बौद्धिक प्रमुख दीपक विस्पुते ने वहां कहा कि विनोद जी का जीवन राष्ट्र के काम, संगठन के प्रति निष्ठा और समाज के लिए संवेदना की मिसाल था। उनके अनुसार विनोद जी ने जीवन का "क्षण-क्षण और कण-कण" देश को सौंपा, और उनकी जिंदगी संघ की कार्यशैली समझने के साथ संघमय जीवन जीने की प्रेरणा भी देती है।
सभा में पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी, अशोक जी पांडे, गोरेलाल और कई दूसरे वरिष्ठजन पहुंचे। सभी ने विनोद कुमार के साथ बिताए पल याद किए और उन्हें श्रद्धांजलि दी।
कारोबारी जिंदगी छोड़कर चुनी राष्ट्रसेवा
दीपक विस्पुते ने बताया कि विनोद जी खूब पढ़े-लिखे थे और चाहते तो कामयाब कारोबारी जीवन चुन सकते थे, लेकिन उन्होंने पूरी उम्र संघ के काम को दे दी। करीब 55 साल के प्रचारक जीवन में वे प्रांत प्रचारक, क्षेत्र प्रचारक और केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रहे। उनके काम में बारीकी, आग्रह के साथ काम कराने की ताकत, इंसान को परखने की नजर और कार्यकर्ताओं की फिक्र साफ दिखती थी। विस्पुते का कहना था कि उन्हें डॉ. हेडगेवार को सामने से देखने का मौका भले न मिला हो, पर विनोद जी जैसे लोगों को देखकर समझ आता है कि संघमय जीवन कैसा होता है। संघ को सिर्फ किताबों से नहीं, ऐसे समर्पित कार्यकर्ताओं की जिंदगी से भी समझा जा सकता है।
विरोधी भी करते थे सादगी की तारीफ
विस्पुते ने आगे कहा कि विनोद जी के विरोधी भी उनकी सादगी और जीवन-मूल्यों के कायल थे। चकाचौंध और अपने प्रचार से दूरी उनके स्वभाव में सहज दिखती थी। अपनी याद सुनाते हुए उन्होंने बताया कि एक समय वे खुद प्रचारक की जिम्मेदारी छोड़कर घर जाने की सोच रहे थे। तब विनोद जी ने उनसे बात की और रास्ता दिखाया, और उसका असर ऐसा रहा कि वह विचार दोबारा मन में नहीं आया। उन्होंने कहा कि विनोद जी की तस्वीर पर फूल चढ़ा देना काफी नहीं है, उनके जीवन से सीख लेकर उसे अपने आचरण में उतारना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
शिवराज बोले, समरसता के कामों में रहती थी उनकी सलाह
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सामाजिक समरसता से जुड़े कई वैचारिक फैसलों और योजनाओं में विनोद जी की सोच और सलाह खास रही। संत रविदास महाकुंभ, टंट्या मामा भील और भीमा नायक से जुड़े कामों और योजनाओं में उनकी गहरी समझ का बड़ा योगदान रहा। शिवराज के मुताबिक विनोद जी समरसता के विषयों को गहराई से समझते थे और उनके मार्गदर्शन से समाज के अलग-अलग वर्गों को जोड़ने की दिशा मिलती थी।
शिवराज ने विनोद कुमार के स्वभाव का एक पहलू बताते हुए कहा कि वे ऊपर से बहुत सख्त दिखते थे, पर दिल से बेहद नरम थे। उनके व्यवहार में अनुशासन और अपनापन साथ-साथ दिखता था। उन्होंने कुछ और यादें भी साझा कीं और कहा कि अगर हम उनके दिखाए रास्ते पर चलने की कोशिश करें, तो भारत माता को परम वैभव तक पहुंचाने के काम में अपना हिस्सा जरूर निभा सकेंगे।
सोलंकी बोले, प्रचारक अनगिनत दिलों में बस जाता है
पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी ने कहा कि यह सभा सिर्फ फूल चढ़ाने का मौका नहीं है, बल्कि विनोद जी के जीवन को जानने-समझने और उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लेने का भी मौका है। उनके अनुसार प्रचारक का जीवन बाहर से भले दिखाई न दे, पर अपने काम, व्यवहार और अपनेपन के रिश्तों से वह अनगिनत लोगों के दिल में पक्की जगह बना लेता है।
सोलंकी ने विनोद जी से जुड़ी कई यादें सुनाईं। आखिरी दिनों का जिक्र करते हुए वे भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले अस्पताल में उन्होंने विनोद जी से बात करनी चाही, पर उनकी हालत देखकर मन बहुत दुखी हो गया। विनोद जी बोल नहीं पा रहे थे और उन्हें ऑक्सीजन की पाइप लगी थी। इसी प्रसंग के साथ उन्होंने विनोद जी से अपना लगाव और उनके जाने से बने खालीपन को जाहिर किया।
पांडे बोले, प्रतिज्ञा को जीवन में उतारना उनसे सीखें
अशोक जी पांडे ने विनोद जी को कार्यकर्ता की फिक्र, समाज के प्रति संवेदना, जीवन की सच्चाई और आगे की दूरदृष्टि का रूप बताया। उनका कहना था कि विनोद जी का जीवन अपनाने लायक है। कोई विचार या प्रतिज्ञा सिर्फ बोलने तक न रहे, उसे जीवन में कैसे उतारा जाए, यह उनसे सीखा जा सकता है। उनका हर काम समाज और संगठन के प्रति समर्पण से प्रेरित था। पांडे ने पूरे पवित्र मन से उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए।
गोरेलाल जी ने गीता का श्लोक सुनाकर बताया उनका स्वभाव
क्षेत्र घुमंतू कार्य प्रमुख गोरेलाल जी ने लंबी यादें साझा कीं। उन्होंने विनोद जी के सात्विक स्वभाव, सहज व्यवहार, कार्यकर्ताओं की भलाई की चिंता और संगठन के लिए मजबूती का जिक्र किया। इस पर उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का वह श्लोक पढ़ा, जिसमें सात्विक कर्ता के लक्षण बताए गए हैं: “मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥” उन्होंने कहा कि आसक्ति और अहंकार से दूर रहकर, धैर्य और उत्साह के साथ, सफलता-असफलता में एक जैसे बने रहने के ये गुण विनोद जी में सहज रूप से दिखते थे।
गोरेलाल जी के अनुसार मूल रूप से उत्तर प्रदेश से आने वाले विनोद जी ने संघ में कई जिम्मेदारियां निभाईं। जिम्मेदारियों से मुक्त होकर उज्जैन में रहते हुए भी उनकी दिनचर्या और काम के प्रति लगन में ढील नहीं आई। नियमित व्यायाम, स्नान-ध्यान, जप-तप, बाबा महाकाल के दर्शन, आरती में हिस्सा लेना और समाज के अलग-अलग वर्गों व कार्यकर्ताओं से सहज बातचीत उनके जीवन का हिस्सा बने रहे। बड़े दायित्व छूटने के बाद भी उन्होंने अपने व्यवहार को नहीं बदला और मिलने आने वालों की संख्या में आए फर्क को मन पर हावी नहीं होने दिया।
गोरेलाल जी ने बताया कि विनोद जी लोगों की क्षमता पहचानकर उन्हें समाज और संगठन के कामों से जोड़ने में माहिर थे। घुमंतू समाज से जुड़े जो लोग आगे चलकर इंदौर में उद्योग लगा चुके थे, उन्हें उन्होंने अपनेपन से संघ के काम से जोड़ा। दीपावली मिलन जैसे आयोजनों से उन्होंने उद्योग जगत के लोगों को इकट्ठा किया और धीरे-धीरे संघ की विचारधारा से परिचित कराया। यह उनके रिश्ते बनाने के सहज और असरदार तरीके का उदाहरण था।
महाकौशल से प्रयागराज कुंभ तक, कार्यकर्ताओं की चिंता
महाकौशल में प्रांत प्रचारक के रूप में विनोद जी के कार्यकाल को याद करते हुए गोरेलाल जी ने बताया कि वे कार्यकर्ताओं को लेकर बहुत संवेदनशील थे। किसी वरिष्ठ कार्यकर्ता की जिम्मेदारी बदलते समय वे उसकी भावनाओं और सक्रियता का ध्यान रखते थे, लेकिन संगठन-विरोधी गतिविधियों के मामलों में जरूरी कड़े फैसले लेने से पीछे भी नहीं हटते थे। उनका दिल मां जैसा नरम था, मगर संगठन के हित में फैसला लेते समय वे दृढ़ और अनुशासित रहते थे।
प्रयागराज कुंभ में करीब एक महीने तक विनोद जी की सक्रियता का जिक्र करते हुए गोरेलाल जी ने बताया कि वे वहां आने वाले पुराने कार्यकर्ताओं, साधु-संतों और पूर्व प्रचारकों की मेहमाननवाजी और उन्हें सक्रिय रखने में लगातार जुटे रहे। उन्हें यह चिंता रहती थी कि कोई पुराना कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित या निष्क्रिय न समझे, बल्कि समाज के काम में अपनी भूमिका निभाता रहे।
अपनी आखिरी मुलाकात बताते हुए गोरेलाल जी ने कहा कि निधन से चार दिन पहले बड़ौदा-मेरठ यात्रा के दौरान उनकी विनोद जी से भेंट हुई थी। तबीयत ठीक न होने के बावजूद उनमें संकल्प और काम के प्रति समर्पण साफ दिख रहा था। उज्जैन पहुंचने के करीब 12 घंटे के भीतर उन्होंने देह त्याग दी। शवयात्रा के समय एक पुराने कार्यकर्ता के भावुक शब्द याद करते हुए उन्होंने कहा कि विनोद जी कई लोगों के लिए ऐसा अपना ठिकाना थे, जहां वे मन की बात रख सकते थे और सलाह पा सकते थे।
मां की करुणा, पिता की चिंता, गुरु का मार्गदर्शन
गोरेलाल जी ने कहा कि विनोद जी में मां के दिल जैसी करुणा, पिता जैसी फिक्र और गुरु जैसा मार्गदर्शन एक साथ दिखता था। उनका जीवन आज के सामाजिक कार्यकर्ताओं को सिखाता है कि कितना बोलना है, क्या बोलना है और कैसा आचरण रखना है।
श्रद्धांजलि सभा में संघ और संघ से प्रेरित संगठनों के वरिष्ठ पदाधिकारी, कार्यकर्ता और विनोद जी से अपनापन रखने वाले कई लोग शामिल हुए। सभा के बाद सबने मौन रखकर विनोद जी को नमन किया और उनके चित्र पर फूल चढ़ाए।