MP High Court : जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में रिटायर्ड जिला न्यायाधीशों के पेंशन भत्ते को लेकर बड़ा मुद्दा गरमाया है। सेवानिवृत्त जजों की एसोसिएशन ने राज्य सरकार के नए नियमों को चुनौती देते हुए याचिका दायर की। इसमें जिला और सत्र न्यायालय के अनुमोदन के बिना 15 हजार रुपये का मासिक भत्ता न देने की शिकायत है। चीफ जस्टिस संजीव कुमार सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान वित्त विभाग के सचिव को तलब कर लिया।
कोर्ट ने साफ कहा कि वृद्ध जजों को हर साल जिला मुख्यालय घूमना पड़ रहा है। यह परेशानी बढ़ा रहा। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि पुराने नियमों में सिर्फ बैंक में जीवन प्रमाण-पत्र जमा करना काफी था। लेकिन अब संशोधित नियमों से भत्ता रुक गया है। कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।
याचिका में मुख्य बात यह है कि 2005 के बाद जिला न्यायालय में नियुक्त जजों को पेंशन का पूरा लाभ नहीं मिलता। पहले के जजों को पेंशन के साथ अलग-अलग भत्ते मिलते थे। जैसे घर किराया, यात्रा भत्ता आदि। 2005 के बाद के जजों ने सेवानिवृत्ति पर 15 हजार रुपये के भत्ते के लिए राज्य सरकार से गुहार लगाई। सरकार ने आदेश जारी कर कहा कि सभी रिटायर्ड जिला जजों को यह राशि दी जाएगी लेकिन शर्त रखी कि हर साल जिला और सत्र न्यायाधीश का अनुमोदन जरूरी।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 2005 से पहले रिटायर्ड जजों की उम्र अब 80 साल से ज्यादा है। उन्हें जिला मुख्यालय जाना मुश्किल है। स्वास्थ्य खराब रहता है। यात्रा करना जोखिम भरा। पहले जीवन प्रमाण-पत्र से काम चल जाता था। अब यह नया नियम उन्हें परेशान कर रहा। भत्ता रुकने से आर्थिक तंगी हो रही। एसोसिएशन ने कहा कि यह भेदभाव है। सभी जजों को समान लाभ मिलना चाहिए।
सुनवाई के दौरान शासकीय अधिवक्ता ने समय मांगा। कहा कि सरकार से दिशा-निर्देश लेने में वक्त लगेगा। याचिकाकर्ता के वकील ने विरोध किया। बताया कि राज्य सरकार के अन्य अधिकारियों के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं। वे रिटायरमेंट के बाद अपने घर पर ही जीवन प्रमाण-पत्र जमा कर सकते हैं।
जजों के साथ अलग व्यवहार क्यों। युगलपीठ ने इसे गंभीरता से लिया। वित्त सचिव को व्यक्तिगत तौर पर तलब किया। अगली सुनवाई पर जवाब मांगा। यह मामला मध्यप्रदेश के सैकड़ों रिटायर्ड जजों से जुड़ा है। अगर कोर्ट सरकार के पक्ष में फैसला दे तो भत्ता नियमित बहाल हो सकता। जजों ने कहा कि यह उनका हक है। सेवा के बदले मिलना चाहिए। कोर्ट की यह कार्रवाई सराहनीय है।
इसी बीच हाईकोर्ट में एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में राहत मिली। साइंस कॉलेज की गेस्ट फैकल्टी डॉ. अर्पणा अवस्थी ने 10 साल से ज्यादा सेवा के बाद फॉलन आउट होने के आदेश को चुनौती दी। जस्टिस एमएस भट्टी की एकलपीठ ने 10 अक्टूबर के कॉलेज प्रबंधन के आदेश पर तुरंत रोक लगा दी।
याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी और अलका सिंह ने बताया कि गेस्ट फैकल्टी को बिना नोटिस निकाला नहीं जा सकता। कॉलेज में स्थायी पदों की कमी है। गेस्ट टीचरों पर निर्भरता है। उन्हें अचानक बाहर करना अन्याय है। अधिवक्ता हितेश शर्मा ने पैरवी की।
एकलपीठ ने जिम्मेदार अधिकारियों को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगा। डॉ. अर्पणा ने कहा कि वह कॉलेज में विज्ञान पढ़ा रही थीं। छात्रों का भविष्य जुड़ा है। फॉलन आउट से परिवार की मुश्किलें बढ़ेंगी। कोर्ट ने स्टे देकर उन्हें राहत दी। अब सुनवाई होगी।