Vidisha Archaeological Museum : विदिशा। मध्य प्रदेश के विदिशा जिला पुरातत्व संग्रहालय केवल एक भवन नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन संस्कृति, कला और आस्था का जीवंत दर्पण है। यहाँ संरक्षित 1700-1800 प्रतिमाएँ, जो 2वीं से 11वीं शताब्दी तक की हैं, भारतीय शिल्पकला की उत्कृष्टता और धार्मिक गहराई को दर्शाती हैं।
सप्त मातृका पैनल, अष्टभुजी दुर्गा, गजलक्ष्मी और 2200 वर्ष पुरानी कुबेर यक्ष-यक्षिणी की प्रतिमाएँ विदिशा की सांस्कृतिक धरोहर को विश्व पटल पर स्थापित करती हैं। बेसनगर से प्राप्त ये मूर्तियाँ कला, धन और ज्ञान के प्रतीक हैं, जो मुगल काल की क्षति के बावजूद अपनी ऐतिहासिक महत्ता बरकरार रखती हैं।
मातृशक्ति का 11वीं शताब्दी का स्वरूप
संग्रहालय का सबसे आकर्षक प्रदर्शन है 10-11वीं शताब्दी का सप्त मातृका पैनल, जो बलुआ पत्थर पर उकेरा गया है। इस पैनल में गणेश, चामुंडा, वैभव लक्ष्मी, वराही, ब्राह्मणी, लक्ष्मी, महामहिम देवी, और अष्टभुजी दुर्गा का समूह है, जिसमें अंत में वीणा वादक दर्शाया गया है।

यह पैनल मातृशक्ति की पूजा की भारतीय परंपरा को उजागर करता है। मार्गदर्शक रामनिवास शुक्ला ने कहा, “यह पैनल हजार वर्ष बाद भी सजीव है। शिल्पकारों की कारीगरी आज भी आकर्षित करती है।” यह संग्रहालय के 1700-1800 प्रदर्शनों में सबसे विशिष्ट है।
पठारी की 10वीं शताब्दी की शक्ति
पठारी (विदिशा) से प्राप्त 10वीं शताब्दी की अष्टभुजी दुर्गा प्रतिमा संग्रहालय का गौरव है। सफेद बलुआ पत्थर की यह मूर्ति देवी को सिंह पर विराजमान दर्शाती है। आठ भुजाओं में विभिन्न आयुध हैं, हालाँकि समय के कारण कुछ खंडित हो गए।

चेहरा भी आंशिक क्षतिग्रस्त है, फिर भी शक्ति और सौंदर्य का प्रभाव अटल है। शुक्ला ने बताया, “यह प्रतिमा मध्यकालीन नारी शक्ति की छवि को दर्शाती है।” यह मूर्ति विदिशा की धार्मिक आस्था और शिल्पकला की गहराई को उजागर करती है।
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गजलक्ष्मी की 10वीं शताब्दी की छवि
10वीं शताब्दी की गजलक्ष्मी प्रतिमा भी संग्रहालय का रत्न है। सफेद बलुआ पत्थर पर बनी, 2 फीट लंबी और 1.5 फीट चौड़ी यह मूर्ति अर्द्ध पर्यकासन में कमल पर विराजित लक्ष्मी को दर्शाती है। चार भुजाओं में से एक में कलश और ऊपर गज (हाथी) समृद्धि के प्रतीक हैं। इसकी बारीक नक्काशी शिल्पकला की उत्कृष्टता दिखाती है। यह मूर्ति धन और वैभव की भारतीय अवधारणा को जीवंत करती है।
कुबेर यक्ष-यक्षिणी: 2200 वर्ष पुराना व्यापारिक गौरव
2वीं शताब्दी की कुबेर यक्ष और यक्षिणी की प्रतिमाएँ बेसनगर से प्राप्त हुईं। 12 फीट ऊँची कुबेर यक्ष प्रतिमा में यज्ञोपवीत, ताबीज-माला, पगड़ी, और धन का गठर है, जो धन और सामर्थ्य का प्रतीक है। यक्षिणी के एक हाथ में धन का गठर और दूसरे में किताब है, जो विदिशा के व्यापार और शिक्षा केंद्र होने का संकेत देती है।

गले का हार, खुले बाल, और कड़े उनकी सुंदरता बढ़ाते हैं। शुक्ला ने कहा, “2200 वर्ष पुरानी कुबेर प्रतिमा भारत में दुर्लभ है। यह बेसनगर के गौरवशाली इतिहास को दर्शाती है।”
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मुगल काल की क्षति
रामनिवास शुक्ला ने बताया कि कई मूर्तियाँ बावड़ी, कुओं, और तालाबों से खंडित अवस्था में मिलीं। मुगल काल में भारतीय मूर्तियों के चेहरे और हाथ तोड़े गए, जिससे सौंदर्य प्रभावित हुआ। फिर भी, इनकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्ता अटल है। शुक्ला ने कहा, “विदिशा की धरोहरें भोपाल, ग्वालियर और दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालयों में हैं। ये विश्व स्तर की कला हैं।”
कला और आस्था का विश्वस्तरीय केंद्र
विदिशा संग्रहालय भारत की प्राचीन सभ्यता का खजाना है। यहाँ की मूर्तियाँ कला, धर्म, और व्यापार का संगम हैं। यह विदिशा को विश्व पटल पर गौरवान्वित करता है। आशा है कि यह धरोहर संरक्षित रहेगी।