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MP News : इंदौर हाईकोर्ट का कड़ा फैसला, VIP नंबर की बोली जीतने के बाद भी रूटीन नंबर देने पर RTO को फटकार

Indore High Court

MP News : इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने वीआईपी वाहन नंबर की नीलामी में गंभीर लापरवाही बरतने पर क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) की कार्यशैली पर कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने इसे प्रशासनिक त्रुटि का बड़ा उदाहरण माना और याचिकाकर्ता को तत्काल उसका हक वाला वीआईपी नंबर देने का स्पष्ट निर्देश जारी किया।

यह मामला स्कॉर्पियो वाहन मालिक का है, जिसने नंबर MP-09 AU 0101 की बोली जीती, पूरी राशि जमा की, लेकिन आरटीओ ने उसे रूटीन नंबर MP-09 AW 6046 थमा दिया।

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जस्टिस प्रणय वर्मा की एकल पीठ ने 11 नवंबर को सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था। गुरुवार 13 नवंबर को कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाया। आदेश में कहा गया कि याचिकाकर्ता द्वारा जमा की गई राशि और सफल बोली के बावजूद रूटीन नंबर जारी करना नियमों का उल्लंघन है। कोर्ट ने रूटीन नंबर को अविलंब निरस्त करने और वीआईपी नंबर MP-09 AU 0101 को याचिकाकर्ता की स्कॉर्पियो पर तुरंत लगाने का आदेश दिया।

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शिकायतों के बावजूद नहीं हुई कार्रवाई

याचिकाकर्ता ने बताया कि ऑनलाइन नीलामी में सफल होने के बाद उन्होंने निर्धारित समय में पूरी राशि जमा कर दी थी। इसके बावजूद आरटीओ ने प्रक्रिया को नजरअंदाज कर गलत नंबर जारी कर दिया।

उन्होंने परिवहन सचिव, ट्रांसपोर्ट कमिश्नर और इंदौर आरटीओ में कई बार लिखित शिकायत की, लेकिन एक महीने तक कोई जवाब नहीं मिला। मजबूरन उन्होंने हाईकोर्ट की शरण ली।

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याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता केके गुरु और केएल पुरोहित ने पैरवी की। सुनवाई में कोर्ट ने आरटीओ से सवाल किया कि जब बोलीदाता को आधिकारिक रूप से विजेता घोषित कर दिया गया और राशि भी स्वीकार कर ली गई, तो फिर नियमों से हटकर रूटीन नंबर क्यों दिया गया?

कोर्ट ने इसे पारदर्शिता की कमी और जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ बताया। सरकारी वकील ने भी कोर्ट के समक्ष उचित कार्रवाई की मांग की, जिसके बाद फैसला याचिकाकर्ता के पक्ष में आया।

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करोड़ों की वसूली फिर भी अनियमितता बरकरार

परिवहन विभाग हर साल फैंसी और वीआईपी नंबरों की नीलामी से करोड़ों रुपए कमाता है। इंदौर आरटीओ भी ऑनलाइन सिस्टम और पारदर्शिता का दावा करता रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है।

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कई लोग शिकायत करते हैं कि बिना दलाल के काम नहीं होता। जो व्यक्ति स्वयं ऑनलाइन प्रक्रिया अपनाता है, उसे तरह-तरह की अड़चनें डाली जाती हैं। इस मामले ने एक बार फिर आरटीओ की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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