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MP Urea Distribution : हरदा में रातभर लाइन में खड़े किसान, तीन काउंटर से वितरण लेकिन पुलिस भी न कर सकी भीड़ कंट्रोल

Farmers queue up for urea in Harda

Farmers Queue up for Urea in Harda : हरदा। मध्य प्रदेश के हरदा जिले में सोमवार शाम से शुरू हुई यूरिया के लिए जद्दोजहद मंगलवार सुबह तक चली, लेकिन यूरिया हाथ न लगा। जिले में खाद की चरमराती व्यवस्था ने किसानों को हताश कर दिया है। जिला मुख्यालय पर डीएमओ (District Marketing Office) और विपणन संघ के गोदामों पर हाहाकार मचा हुआ है।

यहां एमपी एग्रो, विपणन संघ और मार्केटिंग सोसायटी के तीन काउंटरों से रोजाना 240 मैट्रिक टन यूरिया का वितरण हो रहा है। लेकिन यह मात्रा 1 लाख 22 हजार रजिस्टर्ड किसानों के लिए अपर्याप्त साबित हो रही है।

इनमें से केवल 30 हजार ही रेगुलर किसान हैं, बाकी 92 हजार डिफॉल्टर किसानों को सोसायटियों से खाद ही नहीं मिल रही। नतीजा? सब जिला मुख्यालय की ओर रुख कर रहे हैं, जहां नगद भुगतान पर डबल लॉक सिस्टम के गोदाम से खाद लेनी पड़ रही है।

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ग्राम मगरधा के किसान उमेश सिंह राजपूत की कहानी तो दिल दहला देती है। उन्होंने बताया, “रात भर लाइन में खड़े रहे, बारिश में भीगते हुए, मच्छरों से जूझते हुए। सुबह होते ही धक्का-मुक्की शुरू हो गई। एक बैग के लिए कितना अपमान सहना पड़ेगा?”

एसडीएम अशोक कुमार डेहरिया ने अपील की है कि किसान शांति बनाए रखें, लेकिन जब पेट की आग बुझाने को अनाज न हो, तो शांति कैसे बनी रहे? पिछले तीन महीनों से यह समस्या जिले को जकड़ रही है। प्रशासन ने टोकन सिस्टम क्यों नहीं लगाया? अगर डिफॉल्टर किसानों को उनकी सोसायटियों में खाद मिल जाए, तो उन्हें 50-60 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय क्यों भागना पड़े?

46 हजार टन की जरूरत, केवल 18 हजार पहुंची

कृषि विभाग ने रवि सीजन के लिए 46 हजार मैट्रिक टन खाद की मांग की थी। अब तक जिले में सिर्फ 18 हजार मैट्रिक टन यूरिया पहुंच पाया है। यह आंकड़ा देखकर किसानों का गुस्सा भड़कना स्वाभाविक है। खरीफ की फसलें लहलहा रही हैं, लेकिन टॉप ड्रेसिंग के बिना सब बर्बाद हो सकता है।

केंद्र सरकार दावा करती है कि देश में यूरिया की कोई कमी नहीं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और बयान करती है। मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में यह संकट गहरा रहा है, जहां किसान कालाबाजारी और ऊंचे दामों का शिकार हो रहे हैं। हरदा जैसे छोटे जिले में यह समस्या और तीव्र हो जाती है, क्योंकि यहां परिवहन और स्टोरेज की सुविधाएं सीमित हैं।

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किसानों का कहना है कि अगर समय पर खाद न मिली, तो उनकी मेहनत रंग लाएगी ही नहीं। एक बुजुर्ग किसान ने कहा, “हम तो खेतों में जीते हैं, लेकिन यह संकट हमें सड़कों पर ला खड़ा कर दिया। सरकार सोचती क्या है?”

किसानों की मांग–डीएमओ पर ही काउंटर लगें

लाइन में खड़े किसानों का गुस्सा प्राइवेट डीलरों पर भी फूट रहा है। जिले में दो प्राइवेट डीलरों को 20-20 मैट्रिक टन यूरिया आवंटित की गई है, लेकिन उनकी दुकानों का पता ही नहीं चल रहा। एक किसान ने बताया, “हार्दिक एजेंसी को खाद दी गई, लेकिन उनकी दुकान कहां है, कोई नहीं जानता। हम तो भटकते रह गए।”

किसानों ने कलेक्टर से गुहार लगाई है कि डबल लॉक सिस्टम के गोदाम पर ही प्राइवेट डीलरों के काउंटर लगा दिए जाएं। इससे वितरण तेज होगा और लाइनों की समस्या कम हो सकती है।

बता दें कि, मध्य प्रदेश के अन्य जिलों में भी यूरिया की किल्लत की खबरें आ रही हैं। पड़ोसी राज्यों जैसे बिहार और उत्तर प्रदेश में भी किसान लाइनों में खड़े हैं, कालाबाजारी का शिकार हो रहे हैं।

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