High Court reprimanded Bhopal POCSO court judge Kumudini Patel : मध्य प्रदेश। भोपाल के शाहजहांनाबाद में 5 साल की मासूम बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या के POCSO मामले में जज कुमुदिनी पटेल का फैसला अब उन्हें मुश्किल में डाल सकता है। ट्रायल कोर्ट ने मुख्य आरोपी अतुल निहाले को फांसी की सजा तो सुना दी, लेकिन आरोपी की मां बसंती बाई और बहन चंचल को साक्ष्य छुपाने के लिए दी गई सजा में गड़बड़ी सामने आई।
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आदेश के पैरा 145 में एक-एक साल की सजा का उल्लेख था, लेकिन अंतिम तालिका में दो-दो साल लिखा गया। जुर्माना न देने पर अंदर की सजा 1 महीने और बाहर की 3 महीने कर दी गई। यह केस 27 सितंबर 2024 को शुरू हुआ और 10 मार्च 2025 को फैसला आया।
हाईकोर्ट ने इसे जज की लापरवाही माना। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि यह मामला चीफ जस्टिस के पास जाए, ताकि प्रशासनिक कार्रवाई हो सके। बेंच ने नोट किया कि पैरा 145 में बसंती और चंचल की वृद्धावस्था और बच्चों का जिक्र था, लेकिन पेज 78-79 की टेबल में सजा दो साल दिखाई गई। वारंट भी दो साल का तैयार किया गया।
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पहले भी ऐसे मामले देखे गए हैं। 2022 में भोपाल POCSO केस में सजा 10 साल लिखी गई, लेकिन आदेश में 7 साल था। हाईकोर्ट ने स्पष्टीकरण लिया, फैसला सुधारा, और जज को चेतावनी दी। 2019 में इंदौर मर्डर केस में सजा आजीवन लिखी, लेकिन अवधि गलत थी। सुप्रीम कोर्ट तक अपील हुई, लेकिन केवल संशोधन हुआ। 2024 में ग्वालियर रेप केस में आरोपी का नाम गलत था, हाईकोर्ट ने सुधार किया, लेकिन ट्रायल दोबारा नहीं चला।
रितम खाटे सुप्रीम कोर्ट वकील: सीआरपीसी धारा 362 के तहत फैसला लिखने के बाद बदलना मुश्किल है। धारा 465 से सुधार संभव है, लेकिन 80% मामलों में केस बरकरार रहता है। अगर गड़बड़ी आरोपी के पक्ष में साबित हुई, तो राहत मिल सकती है, लेकिन पूरा केस खत्म नहीं होगा।
सीपी श्रीवास्तव भोपाल वकील: फैसला रेक्टीफाई या क्लेरिफाई हो सकता है। धारा 201 और सिविल प्रक्रिया ऑर्डर 20 रूल 3 से जज स्वयं सुधार सकते हैं। सुप्लीमेंट्री जजमेंट से मूल तारीख बनी रहेगी। ट्रायल दोबारा नहीं चलेगा।
दोनों ने कहा कि जज पर कार्रवाई दुर्व्यवहार साबित होने पर ही होती है। लापरवाही पर एडवर्स एंट्री रिकॉर्ड में आ सकती है, प्रमोशन प्रभावित हो सकता है। 90% मामलों में चेतावनी ही मिलती है।