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MP News : मऊगंज में खनन माफिया का राज, अवैध खुदाई और ओवरलोड ट्रक पर प्रशासन की चुप्पी

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MP News : मऊगंज। मध्य प्रदेश के रीवा जिले से अलग होकर बने मऊगंज जिले में खनन माफिया और क्रेशर संचालकों की मनमानी ने हद पार कर दी है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि बिना अनुमति गहराई तक खुदाई हो रही है। एक जगह की लीज लेकर कहीं और खनिज चुराया जा रहा है। अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं। इससे इलाके में हादसे बढ़ गए हैं। पशु, मवेशी और कभी-कभी लोग भी जान गंवा चुके हैं। प्रशासन की उदासीनता पर सवाल उठ रहे हैं। क्या यह खनन का काला खेल कभी रुकेगा?

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क्षेत्र में दो तरह का खेल चल रहा है। पहला, वैध अनुमति के बिना गड्ढे खोदना। जहां 10 फीट खुदाई की मंजूरी है, वहां 40-50 फीट गहराई तक खोदा जा रहा। दूसरा, एक इलाके की लीज पर दूसरे जगह से पत्थर निकालना। आंचलिक इलाकों में कई स्पॉट ऐसे हैं जहां नियम ताक पर हैं। ग्रामीण कहते हैं कि इन गड्ढों में फंसकर जानवर मर चुके हैं। लोगों को भी खतरा है। लेकिन विभाग चुप है। कोई जांच नहीं। कोई कार्रवाई नहीं।

हादसों का सिलसिला थम नहीं रहा। गहराई वाली खुदाई से इलाके में मौतें हो चुकी हैं। एक ग्रामीण ने बताया, “हमारे गांव में दो गायें गड्ढे में गिरकर मर गईं। शिकायत की, लेकिन माइनिंग अधिकारी ने कहा- सब ठीक है।” ऐसे कई मामले हैं। लेकिन खनिज विभाग की ओर से कोई कदम नहीं।

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मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि, अधिकारी जमीनी निरीक्षण शायद ही करते हैं। उनका फोकस सिर्फ कागजों पर है। “पैकेज” या सेटलमेंट की बात हो तो ही मैदान में आते हैं। इसी का फायदा उठाकर क्रेशर वाले बेधड़क पत्थर निकाल रहे हैं।

सड़कें भी तबाह हो चुकी हैं। सीतापुर से पिपराही होते हुए जड़कुद-सीधी रोड पर ओवरलोड ट्रक और डंपर दौड़ते हैं। इनसे सड़कें गड्ढों से भर गईं। धूल का गुबार गांवों की हवा खराब कर रहा है। पैदल चलना मुश्किल। दुर्घटनाएं रोज होती हैं। एक किसान ने कहा, “ट्रक की रफ्तार से बच्चे डरते हैं। सड़क टूट चुकी है। लेकिन परिवहन विभाग सो रहा है।”

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क्रेशर यूनिट्स के साथ बाउंड्री वॉल का उल्लंघन भी आम है। नियम कहते हैं कि हर यूनिट दीवार से घिरी हो। धूल कंट्रोल सिस्टम लगे लेकिन मऊगंज में ज्यादातर क्रेशर खुले में चल रहे। न दीवार, न सुरक्षा। प्रदूषण फैल रहा।

मऊगंज माइनिंग अधिकारी सुनीत राजपूत ने कहा, “क्रेशर का नाम बता दो, हम बंद करवा देंगे।” यह जवाब चौंकाने वाला है। अगर अवैध यूनिट्स चल रही हैं, तो उनका डेटा विभाग के पास क्यों नहीं? यह दिखाता है कि सिस्टम जमीनी हकीकत से कटा हुआ है। अधिकारी शिकायत पर ही सक्रिय होते हैं।

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