Bhopal Metro : भोपाल। कुछ दिन पहले धूमधाम से शुरू हुई भोपाल मेट्रो से शहरवासी कितने संतुष्ट हैं और इसकी वास्तविक हालत क्या है, यह जानने हमारी टीम ने बिल्कुल एक आम यात्री की तरह मेट्रो का सफर किया। यात्रियों से बातचीत की, स्टेशनों का रियलिटी चेक किया।
एम्स से सुभाष नगर तक सफर में हमने देखा कि यात्रियों के लिए यह अनुभव “आधा-अधूरा” साबित हो रहा है। शहर की मेट्रो फिलहाल सुविधाओं की कमी और अव्यवस्थाओं के बीच जूझ रही है। यानी देर आने के बावजूद मेट्रो दुरुस्त नहीं आई।
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सवा घंटे का लंबा इंतजार
भोपाल मेट्रो को शहर की रफ्तार बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, लेकिन फिलहाल सिंगल ट्रेन ही सुभाष नगर से एम्स और एम्स से सुभाष नगर की तरफ चल रही है। ऐसे में यात्रियों को एक से डेढ़ घंटे तक का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।
सुभाष नगर से एम्स इलाज करने जा रहे एक बुजुर्ग ने बताया कि मैं हार्ट और शुगर का पेशेंट हूं, मुझे जल्दी एम्स अस्पताल पहुंचना था लेकिन 40 मिनट सुभाष नगर स्टेशन पर ही इंतजार करना पड़ा। वहां पर न बैठने की व्यवस्था थी न पीने के लिए पानी मिला।
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मेले जैसी मैन्युअल टिकटिंग
भोपाल मेट्रो में सफर करने के लिए अगर आप अभी टिकट खरीदने लाइन में लगेंगे तो आपको किसी मेले में झूले पर बैठने के लिए जिस तरह टिकट ली जाती है वैसा अनुभव होगा।
दरअसल, फिलहाल भोपाल के मेट्रो स्टेशनों पर मैन्युअल टिकट मिल रही है जिनको लेकर आप मेट्रो में सफर कर सकते हैं। लेकिन शर्त यह है कि जब आप अपने डेस्टिनेशन स्टेशन पर उतर जाएंगे तो वहां मौजूद सिक्योरिटी गार्ड को आपको टिकट वापस करनी होगी। वह उसे फाड़कर एक बक्से में डाल देंगे।
इसमें एक और गजब की बात सामने आई कि ट्रेन में टिकट चेक करने की ड्यूटी भी स्टेशन पर तैनात सिक्योरिटी गार्ड्स की ही है। आप किसी भी स्टेशन का टिकट लेकर कहीं भी सफर कर ले तो शायद कोई पूछने वाला या देखने वाला न मिले।
स्टूडेंट्स ने कहा कितना पैसा लेंगे
भोपाल मेट्रो के किराए से शहर के स्टूडेंट्स भी ना खुश नजर आए। उन्होंने कहा कि एम्स से लेकर बोर्ड ऑफिस चौराहे तक ₹30 लिए जा रहे हैं जबकि पब्लिक ऑटो में सिर्फ ₹15 लिए जाते हैं।
इतना किराया देकर भी लंबा इंतजार करना पड़ता है। इसे कम करना चाहिए या फिर स्टूडेंट्स के लिए मंथली पास जैसी सुविधाएं मेट्रो कॉरपोरेशन को देनी चाहिए।
कहीं लिफ्ट, कहीं पार्किंग नहीं
8 में से 7 स्टेशनों पर बुनियादी काम अब भी अधूरे हैं। रानी कमलापति स्टेशन पर स्काईवॉक पर सुरक्षा के लिए सिर्फ सिंगल रेलिंग लगाई गई है, जो काफी खतरनाक हो सकती है। लिफ्ट का सिर्फ ढांचा खड़ा है।
एम्स स्टेशन: एक तरफ काम पूरा है, तो दूसरी तरफ काम बाकी है।
अलकापुरी और डीआरएम ऑफिस: यहां निर्माण सामग्री बिखरी पड़ी है और यात्रियों के चलना मुश्किल है।
एमपी नगर: यहां एस्केलेटर तो चालू हैं, लेकिन आम जनता के लिए पार्किंग का कोई अता-पता नहीं है। महिलाओं के लिए स्पेसिफिक टिकट विंडो नहीं है।
यात्रियों की सुरक्षा
सिग्नलिंग सिस्टम पूरी तरह प्रभावी नहीं होने और स्टेशनों पर पीने के पानी व बैठने की बेंचों की कमी के कारण यात्रियों को असुविधा हो रही है। अधिकारियों का कहना है कि वे लगातार मॉनिटरिंग कर रहे हैं और जल्द सुधार किया जाएगा, लेकिन फिलहाल भोपाल मेट्रो “रफ्तार” से ज्यादा अपनी “अधूरेपन” को लेकर चर्चा में है।
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दिल्ली मेट्रो की तुलना में काफी काम बाकी
दिल्ली मेट्रो की तुलना में भोपाल में अभी काफी कुछ करना बाकी है। दिल्ली में हर 5 मिनट में एक मेट्रो ट्रेन उपलब्ध होती है, टिकट के लिए टोकन सिस्टम है लेकिन भोपाल में फिलहाल डेढ़ घंटे का इंतजार है।
मैन्युअल टिकट खरीदने पड़ते हैं और मूलभूत सुविधाओं की कमी से यात्री परेशान हो रहे हैं। लोगों की मांग है कि मेट्रो सुभाष नगर से एम्स तक काफी कम डिस्टेंस के लिए चल रही है।
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इसे कोलार, न्यू मार्केट, मंडीदीप और सीहोर तक कनेक्ट करना चाहिए ताकि बड़े पैमाने पर लोगों को लाभ मिल सके। भोपाल मेट्रो शुरू तो हो गई, लेकिन लंबा इंतजार, मैन्युअल टिकटिंग और अधूरी सुविधाओं के कारण यात्रियों को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।