Dussehra 2025 : विदिशा। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के नटेरन तहसील में स्थित रावणाग्राम (रावन पंचायत) गांव धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का अनोखा केंद्र है। यहां परमारकालीन (11वीं शताब्दी) प्राचीन रावण बाबा मंदिर स्थित है, जहां रावण की 10 फीट लंबी लेटी हुई विशाल प्रतिमा विराजमान है।
गांव के ब्राह्मण परिवार खुद को रावण के कन्याकुब्ज ब्राह्मण वंशज मानते हैं, और वे रावण को विद्या, वीरता और ज्ञान के देवता के रूप में पूजते हैं। दशहरा पर जहां देशभर में रावण का पुतला जलाया जाता है, वहीं यहां रावण बाबा को शुभ कार्यों का पहला निमंत्रण दिया जाता है। यह परंपरा 500 वर्षों से चली आ रही है, जो सांप्रदायिक सद्भाव और रामायण की गहन व्याख्या की मिसाल है। गांव के लोग रावण को लंका का राजा नहीं, बल्कि शिव भक्त और विद्वान के रूप में सम्मान देते हैं।
मंदिर का ऐतिहासिक महत्व
रावणाग्राम गांव विदिशा से करीब 40 किमी दूर है, और इसका नाम ही रावण के सम्मान में पड़ा है। मंदिर में स्थापित प्रतिमा परमार वंश (11वीं शताब्दी) की है, जो लेटी हुई अवस्था में है। स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, रावण कन्याकुब्ज ब्राह्मण थे, जो कन्नौज क्षेत्र से जुड़े थे। गांव के ब्राह्मण परिवार इस वंश से खुद को जोड़ते हैं, और रावण को कुलदेवता मानते हैं।
मंदिर के पुजारी, बताते हैं, “रावण शिव का परम भक्त था। हम उसे बुराई का प्रतीक नहीं, बल्कि ज्ञान का सागर मानते हैं। दशहरा पर हम रावण का पूजन करते हैं, न कि पुतला जलाते।”
मंदिर की स्थापना 500 वर्ष पूर्व हुई मानी जाती है। प्रतिमा को कभी सीधा करने की कोशिश की गई, लेकिन जेसीबी में आग लग गई। एक यज्ञ के दौरान संत ने प्रसाद न चढ़ाया, तो तेज आंधी-बारिश आ गई। माफी मांगकर प्रसाद अर्पित करने पर यज्ञ संपन्न हुआ। ये कथाएं रावण बाबा की शक्ति का प्रमाण मानकर सुनी जाती हैं।
शुभ कार्यों का पहला निमंत्रण
ग्रामीणों की परंपरा अनोखी है। किसी भी शुभ कार्य—विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश—से पहले रावण बाबा को पहला निमंत्रण दिया जाता है। शादी का पहला कार्ड मंदिर में रखा जाता है। विवाह की शुरुआत प्रतिमा की नाभि में तेल चढ़ाकर होती है।
पंडित तिवारी कहते हैं, “बाबा को आमंत्रित करने से कार्य सिद्ध होता है। वे परिवार के रक्षक हैं।” दशहरा पर गांव में विशेष पूजन और भंडारा होता है, जहां रावण को फल, मिठाई और वस्त्र चढ़ाए जाते हैं। ब्राह्मण परिवार रावण को राम का सौतेला भाई मानते हैं, और उनकी पूजा राम भक्ति का हिस्सा बताते हैं।
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यह मंदिर सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है। दशहरा पर रावण का पुतला न जलाकर पूजन करने से गांव में एकता का संदेश जाता है। ग्रामीण कहते हैं, “रावण विद्वान था, उसकी भक्ति अनन्य थी। बुराई का प्रतीक बनाकर हम इतिहास को तोड़ मरोड़ते हैं।” विदिशा जिले में मंदसौर के साथ यह एकमात्र जगह है जहां रावण को पूजा जाता है। मंदिर पर्यटकों के लिए आकर्षण है, और नवरात्रि पर भक्तों का तांता लगता है।