Betul Honour Killing Case : बैतूल। मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के पाथाखेड़ा इलाके में 1 जनवरी 2014 को हुई एक बेटी की क्रूर हत्या के मामले में आखिरकार न्याय मिल गया। प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत ने 11 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कंचन कुशवाह (14 वर्ष) के पिता सुरेंद्र प्रसाद कुशवाह समेत परिवार के 6 सदस्यों को उम्रकैद की सजा सुनाई। यह मामला शुरू में आत्महत्या बताया गया था, लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने सच्चाई उजागर कर दी।
जानकारी के मुताबिक , पीएम रिपोर्ट में सामने आया कि, कंचन की गला दबाकर हत्या की गई थी। अदालत ने दोषियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) और 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत आजीवन कारावास, तथा धारा 201 (साक्ष्य नष्ट करने) के तहत 7 वर्ष की अतिरिक्त सजा और जुर्माना लगाया।
MP Crime News : बिजासनी डैम में मिला गेस्ट फैकल्टी का शव, बैतूल पुलिस को आत्महत्या की आशंका
बाथरूम में जली हुई लाश
यह घटना 1 जनवरी 2014 की थी, जब कंचन कुशवाह, जो 9वीं कक्षा की एक होनहार छात्रा थी, अपने फूफा के घर के बाथरूम में जली हुई हालत में मिली। शव के पास दरवाजा अंदर से बंद नहीं था, जो संदेहास्पद था।
परिजनों ने इसे आत्महत्या करार दिया, लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने खुलासा किया कि कंचन का गला दबाकर हत्या की गई थी। उसके बाद शव को जलाकर साक्ष्य मिटाने की कोशिश की गई। कंचन के मायके वालों ने तुरंत संदेह जताया, लेकिन ससुराल पक्ष ने दबाव बनाकर मामला दबाने की कोशिश की।
जांच अधिकारी सुरेंद्र नाथ यादव ने बताया कि प्रारंभिक जांच में परिजनों ने इनकार किया, लेकिन सबूतों ने उन्हें फंसा दिया। कंचन की उम्र महज 14 वर्ष थी और वह एक साधारण परिवार की बेटी थी। आरोप लगाया कि कंचन का रिश्ता किसी लड़के से जोड़ने की बात पर परिवार ने हत्या कर दी।
6 दोषियों को उम्रकैद
लोक अभियोजक गोवर्धन सूर्यवंशी ने बताया कि प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत में सुनवाई के बाद कोर्ट ने कंचन के पिता सुरेंद्र प्रसाद कुशवाह, दादी गीता कुशवाह, चाचा दीपक सिंह और उनकी पत्नी राधिका, तथा अन्य दो सदस्य ओमप्रकाश और लक्ष्मण को दोषी ठहराया।
इन पर हत्या, षड्यंत्र और साक्ष्य छिपाने के आरोप साबित हुए। अदालत ने IPC की धारा 302 और 120-बी के तहत आजीवन कारावास, तथा धारा 201 के तहत 7 वर्ष की सजा और जुर्माना लगाया।
कुल 7 आरोपी थे, जिसमें कंचन का फूफा जोगेंद्र भी शामिल था। सुनवाई के दौरान जोगेंद्र की मौत हो गई, जबकि अनुराधा को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। यह फैसला 11 साल की लंबी प्रक्रिया का नतीजा है, जिसमें अदालत ने हर पहलू की गहन जांच की। अभियोजक ने कहा, “यह फैसला कंचन जैसे अन्य पीड़ितों के लिए न्याय का प्रतीक बनेगा।”
इस मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं था, जो इसे और पेचीदा बनाता था। पुलिस ने पड़ोस के 70 लोगों के बयान दर्ज किए, जिनसे साबित हुआ कि घटना के दिन घर में कोई बाहरी व्यक्ति नहीं आया था। सभी बयान परिवार के सदस्यों की ओर इशारा करते थे।
जांच अधिकारी सुरेंद्र नाथ यादव ने बताया, “पोस्टमॉर्टम से गला दबाने की पुष्टि हुई। उसके बाद शव जलाया गया, जो साक्ष्य नष्ट करने का प्रयास था। परिजनों ने शुरू में झूठ बोला लेकिन बयानों ने उन्हें बेनकाब कर दिया।”
परिवार ने पुलिस पर ही पक्षपात का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट तक गुहार लगाई, लेकिन सबूतों के आगे हार गए। यह मामला आरुषि-हेमराज हत्याकांड की याद दिलाता है, जहां परिवार की संलिप्तता ने जांच को जटिल बना दिया।