हाइलाइट्स
- भोपाल में 23% डॉक्टरों के पद खाली
- किसी भी जिला अस्पताल में स्किन विशेषज्ञ नहीं
- डिप्टी सीएम ने भर्ती प्रक्रिया तेज करने के दिए निर्देश
- मरीजों को इलाज के लिए बड़े अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ रहा
MP government hospital crisis : भोपाल। राजधानी भोपाल की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों गंभीर संकट से गुजर रही है। एक ओर अस्पतालों में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की भारी कमी है, तो दूसरी ओर सरकार भर्ती प्रक्रिया तेज करने के दावे कर रही है।
जिला स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार करीब 23 प्रतिशत डॉक्टरों के पद खाली हैं।
स्किन विशेषज्ञ तक नहीं, मरीज परेशान
सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि किसी भी जिला अस्पताल में चर्म रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं है। हर साल 70 हजार से अधिक मरीज स्किन से जुड़ी समस्याओं के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें या तो सामान्य चिकित्सकों पर निर्भर रहना पड़ता है या बड़े अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।
डिप्टी सीएम ने दिए भर्ती के निर्देश
इन हालातों के बीच उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने मंत्रालय में स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठक की। उन्होंने लंबित भर्तियों को समय-सीमा में पूरा करने, भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाने और प्रशासनिक औपचारिकताओं को समय पर पूरा करने के निर्देश दिए।
जेपी अस्पताल में सबसे ज्यादा संकट
राजधानी के जेपी अस्पताल में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं, जहां 17 विशेषज्ञों के पद खाली हैं। सिविल सर्जन का पद भी लंबे समय से रिक्त है और फिलहाल अतिरिक्त प्रभार के भरोसे काम चल रहा है, जिससे कई जरूरी सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।
महिला और नवजात सेवाओं पर असर
कैलाशनाथ काटजू जच्चा-बच्चा अस्पताल में भी विशेषज्ञों की कमी बनी हुई है। यहां मेडिसिन विशेषज्ञ के दोनों पद खाली हैं, जिससे हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी और नवजात शिशुओं के इलाज पर असर पड़ रहा है। कई मामलों में मरीजों को अन्य अस्पतालों में रेफर करना पड़ रहा है।
ग्रामीण इलाकों में और भी खराब हालात
बैरासिया सिविल अस्पताल में पिछले छह साल से मेडिसिन विशेषज्ञ नहीं है। इसके अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण पद भी खाली हैं। ग्रामीण मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है, जो आपात स्थिति में गंभीर खतरा बन सकती है।
पीएचसी और अन्य अस्पतालों की स्थिति भी कमजोर
गोविंदपुरा और बैरागढ़ के अस्पतालों में भी कई विशेषज्ञ पद खाली हैं। वहीं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी मेडिकल ऑफिसर तक की कमी है, जिससे बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।