रियासत से राजधानी तक, ये है भोपाल की कहानी

मध्य प्रदेश का सुंदर, शांत और झीलों का शहर भोपाल यूंही नहीं बना। जहां आज भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी है, वहीं एक वक्त ऐसा था जब इसे बनाने में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। इसकी नींव सदियों पुरानी है। इसके इतिहास की शुरुआत गोंड राजवंश से हुई। 7वीं सदी में गोंड राजा भूपाल सिंह शाह सल्लाम ने 669-679 ईस्वी के बीच इस शहर की स्थापना की थी। उस समय इस शहर को ‘भूपाल’ नाम दिया गया था, जो आगे चलकर ‘भोपाल’ बना। भोपाल उस समय एक प्रमुख गोंड रियासत की राजधानी था। लेकिन गोंड राजाओं के शासन के बाद यह क्षेत्र कई बार लुटेरों और बाहरी लोगों का शिकार हुआ। शहर की अस्थिरता और कमजोर होती सुरक्षा व्यवस्था ने इसे नए सत्ताओं के पास जाने को मजबूर किया। दोस्त मोहम्मद खान की भूमिका मुगल साम्राज्य के पतन के बाद एक अफगान सैनिक दोस्त मोहम्मद खान (1672–1728) ने मालवा क्षेत्र में अपनी पकड़ बनानी शुरू की। कहते हैं कि वह एक बहादुर सैनिक और रणनीतिकार था, जिसने भाड़े के सैनिक के रूप में स्थानीय रियासतों की मदद की। उन्हीं दिनों रानी कमलापति के पति राजा निज़ाम शाह की मौत हो गई थी। ऐसे में रानी ने अपने राज्य की सुरक्षा के लिए दोस्त मोहम्मद खान को आमंत्रित किया। रानी की मौत के बाद खान ने उस छोटे गोंड राज्य पर कब्जा कर लिया और भोपाल गांव पर अधिकार कर लिया। भोपाल राज्य की नींव 1720 से 1726 के बीच दोस्त मोहम्मद खान ने भोपाल को एक किलेबंद शहर में बना दिया। इसके बाद ‘नवाब’ की उपाधि ग्रहण कर ली। इस तरह भोपाल एक संगठित राज्य बन गया। दोस्त मोहम्मद खान ने मुगल दरबार में सैयद बंधुओं के साथ गठबंधन कर लिया। जिससे हैदराबाद के निज़ाम मीर क़मर-उद-दीन से उसकी दुश्मनी हो गई। और 1724 में निज़ाम ने भोपाल पर आक्रमण कर दिया। जिसमें दोस्त मोहम्मद को पराजय स्वीकार करनी पड़ी। मराठा और ब्रिटिश प्रभाव भोपाल का माहौल यहीं शांत नहीं हुआ। सन 1737 में पेशवा बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में मराठा सेना ने भोपाल पर आक्रमण किया। जिसमें मुगलों को हरा दिया। इसके बाद भोपाल मराठा के हाथ में आ गया। लेकिन 1818 के तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध के बाद नवाबों ने ब्रिटिश सरकार के साथ एक संधि की और भोपाल एक ब्रिटिश रियासत बन गया। नवाबों का शासन दोस्त मोहम्मद खान के बेटे नवाब यार मोहम्मद खान ने इस्लामनगर को राजधानी बनाया। लेकिन उनके उत्तराधिकारी नवाब फैज़ मुहम्मद खान ने राजधानी को फिर भोपाल स्थानांतरित कर दिया। इस काल में ममोला बाई जैसे प्रभावशाली महिलाओं ने भी शासन में एक अहम भूमिका निभाई। भोपाल के इतिहास में महिलाओं का विशेष स्थान रहा है। राजा निज़ाम शाह की पत्नी रानी कमलापति ने न केवल अपने राज्य को सहेजा बल्कि भोपाल के विकास में भी योगदान दिया। उनकी याद में आज कमला पार्क और रानी कमलापति रेलवे स्टेशन मौजूद हैं। स्वतंत्रता और विलय 1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद भोपाल की आखिरी वारिस आबिदा सुल्तान पाकिस्तान चली गईं। उनकी बहन साजिदा सुल्तान को रियासत की उत्तराधिकारी बनाया गया। आखिर में 1 जून 1949 को भोपाल राज्य भारत में विलय कर दिया गया। यह एक भारतीय राज्य का हिस्सा बन गया।
भोपाल की वीरांगना रानी कमलापति की कहानी

जब भी मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के इतिहास का जिक्र होता है, उसमें कई किरदास याद आ जाते हैं। लेकिन इसमें एक किरदार ऐसा भी है जिसे आज तक याद किया जाता है। छोटे से लेकर बड़े तक के मुंह पर उनका नाम है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं ‘रानी कमलापति’ की। जब भी भोपाल के गौरवशाली अतीत की बात सामने आती है, तो रानी कमलापति का नाम सम्मान से लिया जाता है। रानी कमलापति न सिर्फ सौंदर्य की प्रतीक थीं, बल्कि साहस, आत्मबलिदान और रणनीतिक की मिसाल भी बनीं। मध्यप्रदेश की माटी में उनका जीवन, प्रेम, संघर्ष और बलिदान एक छाप छोड़ गया है। गोंड वंश से था रानी कमलापति का संबंध मध्यप्रदेश में सदियों से प्रभावशाली रहे गोंड वंश से रानी कमलापति का संबंध था। उनका विवाह गिन्नौरगढ़ के शक्तिशाली गोंड राजा निजाम शाह से हुआ था। गिन्नौरगढ़ भोपाल से लगभग 55 किलोमीटर दूर स्थित है। आपको बता दें कि 750 गांवों को मिलाकर बना ये एक विशाल राज था। जहां राजा निजाम शाह निडर, वीर और प्रजावत्सल शासक थे। बताया जाता है कि रानी कमलापति उनकी सबसे प्रिय रानी थीं। राजा निजाम शाह की थी सात पत्नियां वैसे तो राजा निजाम शाह की सात पत्नियां थीं, लेकिन रानी कमलापति न केवल सुंदर थी, बल्कि राजकीय कार्यों में भी अत्यंत कुशल थीं। बताया जाता है कि वे राज्य की प्रशासन व्यवस्था, जनता की समस्याएं और कई मामलों में भी सक्रिय भूमिका निभाती थीं। जिसके चलते राजा निजाम शाह ने अपनी रानी के प्रति प्रेम और सम्मान दिखाते हुए 1720 में एक भव्य सात मंजिला महल का बनवाया। जो आज भी भोपाल की पहचान है, जिसे हम रानी कमलापति महल कहते हैं। रानी कमलापति महल रानी कमलापति महल का निर्माण लाखोरी ईंटों से हुआ था। इसकी बनावट में कमल की पंखुड़ियों जैसी सुंदर कलाकृति देखने को मिलती है। यह महल न सिर्फ वास्तुकला की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि रानी के जीवन की अनेक कहानियों को भी दिखाता है। रानी कमलापति का जीवन तब बदल गया, जब राजा निजाम शाह के भतीजे आलम शाह ने सत्ता की लालसा में अपने ही चाचा की हत्या कर दी। आलम शाह बाड़ी रियासत का शासक था और गिन्नौरगढ़ की समृद्धि और सत्ता पर उसकी नजर थी। उसने षड्यंत्र रच राजा को खाने में विष देकर मार डाला। पति की मौत के बाद टूट गई थी रानी पति की मौत के बाद रानी को अपने बेटे नवल शाह के साथ जीवन की चिंता सताने लगी। आलम शाह की बुरी नजर अब रानी और उनके पुत्र पर थी। ऐसे में रानी कमलापति अपने बेटे के साथ गिन्नौरगढ़ छोड़कर भोपाल आ गईं और अपने सात मंजिला महल में रहने लगीं। हालांकि, उनके भीतर पति की हत्या का बदला लेने की आग धधक रही थी, पर उनके पास न सेना थी और न धन। इसी दौरान अफगान योद्धा दोस्त मोहम्मद खान जो कभी मुगल सेना का हिस्सा था, भोपाल पर अधिकार की योजना बना रहा था। रानी कमलापति ने उससे सहायता मांगी। दोस्त मोहम्मद ने मदद के बदले एक लाख रुपए की मांग की। रानी ने यह शर्त स्वीकार कर ली, हालांकि उनके पास इतनी बड़ी राशि नहीं थी। लेकिन वे बदला लेना चाहती थीं और इसके लिए हर जोखिम उठाने को तैयार थीं। बताया जाता है कि, रानी की सहायता के बदले दोस्त मोहम्मद ने गिन्नौरगढ़ पर कब्जा कर लिया। इसके बाद रानी के बेटे नवल शाह की भी हत्या कर दी। रानी इस विश्वासघात से टूट गईं। कहते हैं कि दोस्त मोहम्मद के बढ़ते दबाव और धोखे से परेशान होकर रानी कमलापति ने अपने महल से छलांग लगाकर अपने प्राण त्याग दिए। उस समय वहां से कोलांस नदी बहा करती थी। रानी कमलापति की यह गाथा आज भी भोपाल की हवाओं में गूंजती है। उनका महल, जो अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है, इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। 1989 में भारत सरकार ने इस स्मारक को संरक्षित घोषित किया। नवंबर 2021 में रानी कमलापति के अद्भुत योगदान को सम्मान देने के उद्देश्य से भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर रानी कमलापति रेलवे स्टेशन रखा गया। इसके साथ ही भोपाल का कमला पार्क भी उनकी याद में बनाया गया है।
ये हैं भोपाल में घूमने की खास जगहें

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को यूं ही झीलों का शहर नहीं कहा जाता है। यहां की खूबसूरती हर इंसान को अपनी ओर खींच लेती है। ये शहर जितना शांत है उतना ही चंचल हैं। हरियालियों के बीच में बसे इस शहर की पहचान बड़े तालाब से भी होती है। अगर आप भोपाल में काम, पढ़ाई या फिर किसी व्यवसाय के सिलसिले में यहां आने की सोच रहे हैं या फिर कुछ दिनों के लिए घूमने का प्लान बना रहे हैं तो यहां की मशहूर जगहों को जानना आपके लिए बेहद जरूरी है। तो आइए देरी किस बात की? जानते हैं। इस शहर में आपको न सिर्फ आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी। बल्कि यहां की सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सुंदरता आपका दिल जीत लेगी। यहां की अच्छी कनेक्टिविटी, साफ-सुथरा वातावरण, झीलों की छांव और ऐतिहासिक इमारतें इसे बाकी शहरों से अलग बनाता है। आइए जानते हैं भोपाल की कुछ खास और प्रसिद्ध जगहों के बारे में। ऊपरी झील (Upper Lake) भोपाल की पहचान मानी जाने वाली झील को भोजताल या बड़ा तालाब भी कहा जाता है। ये करीब 1000 साल पुरानी है। जानकारी के लिए आपको बता दें कि, यह एक मानव निर्मित झील है जिसे राजा भोज ने बनवाया था। यहां का नजारा बेहद सुकून देने वाला होता है, खासकर शाम के वक्त। यहां क्या है खास? यहां बोटिंग और पैरासेलिंग जैसी वॉटर स्पोर्ट्स है। वहीं पास में कमला पार्क है जहां आप वॉक या फिर पिकनिक बना सकते हैं। इतना ही नहीं फोटोग्राफी और शांत वातावरण का आनंद भी उठा सकते हैं। भीमबेटका गुफाएं भीमबेटका गुफाएं 30,000 साल पुरानी सभ्यता की झलक एक है। जो मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित है। भीमबेटका गुफाएं यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट हैं। ये जगह आपको आदिमानव के समय में ले जाएगी। यहां की दीवारों पर बनी पेंटिंग्स हजारों साल पुरानी हैं। यहां आकर आप इसकी शैलचित्र यानी रॉक पेंटिंग्स देखें। इसके बाद गुफाओं की प्राचीन बनावट और फिर जंगलों के बीच शांति का अनुभव लें। वन विहार राष्ट्रीय उद्यान वन विहार राष्ट्रीय उद्यान एमपी की राजधानी भोपाल में हैं। हरियालियों से घिरे इस उद्यान में आपको कई जगह देखने को मिलती है। अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं, तो भोपाल के बीचोबीच फैला यह नेशनल पार्क आपको जरूर पसंद आएगा। यहां आप टाइगर, भालू, हिरण, तेंदुआ जैसे जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास में देख सकते हैं। यहां आकर आप जंगल सफारी कर सकते हैं। इसके साथ ही बर्ड वॉचिंग, झील के किनारे सुकून के पल भी बीता सकते हैं। शौकत महल भोपाल में स्थित शौकत महल अनोखी वास्तुकला की मिसाल है। ये शहर के पुराने हिस्से में है। यह महल यूरोपीय और इस्लामी आर्किटेक्चर का अद्भुत संगम है। जानकारी के लिए आपको बता दें कि, यह महल एक समय में भोपाल की शासक रहीं बेगम सिकंदर की रिहाइश था। इसकी डिजाइन कुछ हटकर और बेहद दिलचस्प है। इसमें त्रिकोणाकार छतें और गोथिक शैली खास हैं। इतना ही नहीं इतिहास प्रेमियों के लिए ये बेहद ही खूबसूरत जगह है। वहीं अगर आप फोटो लेने के शौकीन हैं तो आपके लिए ये शानदार जगह है। निचली झील (Lower Lake) बड़ा तालाब के बारे में तो बहुत सुना होगा। अब छोटे तालाब के बारे में भी जानिए। निचली झील वही है। जहां का शांत पानी और खूबसूरत नजारे आपको अपनी ओर खींचेंगे। छोटा तालाब कहे जाने वाली यह झील ऊपरी झील से जुड़ी हुई है। जिसने भोपाल की खूबसूरती को और बढ़ा देती है। पहाड़ियों से घिरी यह झील शहर के बीचोंबीच होते हुए भी आपको एक शांत अनुभव देती है। यहां आकर आप बोट क्लब में बोटिंग कर सकते हैं। यहां वाटर स्पोर्ट्स जैसे जेट स्कीइंग और स्पीड बोट है। इतना ही नहीं आप रोमांटिक वॉक और फैमिली पिकनिक भी माना सकते हैं। सैर सपाटा ये जगह बच्चों और परिवार के लिए मस्ती भरा स्थान है। जो खासतौर पर बच्चों के मनोरंजन और परिवारों के लिए बनाया है। यहां झील के किनारे घूमने से लेकर बोटिंग, झूले, मिनी ट्रेन की सवारी और सस्पेंशन ब्रिज तक सब कुछ एक ही जगह मिलता है। यहां आरसीसी का पहला पैदल पुल बना है। जहां आप घूम सकते हैं। बच्चों के लिए खेल के लिए कई जगह है। इतना ही नहीं शाम को लाइट और म्यूजिक शो भी रहता है।
जरूर जाएं रायसेन जिले के इन शानदार पर्यटन स्थलों पर

मध्य प्रदेश के मध्य भाग में स्थित रायसेन जिला अपने ऐतिहासिक किस्सों के लिए जाना जाता है। यहां की कहानियां और खूबसूरती आपका मन मोह लेगी। अगर आप अपने परिवार के साथ कहीं घूमने जाने का प्लान बना रहे हैं, तो मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे रायसेन जिले एक अच्छा विकल्प होगा। यहां का स्वच्छ वातावरण, ऐतिहासिक धरोहरें और प्राकृतिक सुंदरता न सिर्फ बच्चों को अपनी ओर खींचेगा बल्कि पूरे परिवार के लिए एक यादगार सफर रहेगा। अब आप सोच रहे होंगे कि यहां ऐसा क्या है घूमने लायक? तो चलिए हम आपको बताते हैं। सांची सांची, शांति और बौद्ध संस्कृति की नगरी है। ये भोपाल से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित है। जहां सांची बौद्ध धर्म की ऐतिहासिक धरोहर है। यह स्थान महात्मा बुद्ध के अनुयायी महामोद्गल्यायन और सारिपुत्र के अस्थि कलशों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। सम्राट अशोक द्वारा निर्मित सांची स्तूप कला का एक अद्भुत उदाहरण हैं। इतना ही नहीं ये बौद्ध संस्कृति की गहराई को भी दर्शाते हैं। जानकारी के लिए बता दें कि, सांची को यूनेस्को ने 1989 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था। यह जगह पहाड़ी पर स्थित है, जो प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिकता का अद्भुत मेल दिखाता है। यहां आप बच्चों और परिवार या फिर दोस्तों के साथ घूमने जा सकते हैं। भीमबेटका भीमबेटका शैलचित्रों की एक अद्भुत दुनिया है। ये मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 40 किलोमीटर दूर रायसेन जिले में स्थित है। भीमबेटका सालों पुरानी गुफा है। कहा जाता है कि गुफाओं में आदिमानवों द्वारा बनाए गए शैलचित्र आज भी सुरक्षित हैं। यह जगह मानव सभ्यता के शुरुआती इतिहास को दर्शाता है। अगर आपको इतिहास में इंटरेस्ट है तो आपको ये जगह बहुत पसंद आने वाली है। यहां बने हुए चित्र करीब 10,000 से 30,000 साल पुराने बताए जाते हैं। आपको बता दें कि, भीमबेटका को यूनेस्को ने 2003 में विश्व धरोहर स्थल घोषित कर किया था। यहां 550 मिलियन वर्ष पुराने डिकिंसोनिया जीवाश्म (Rock Shelters of Bhimbetka) भी मिले हैं, जो इसे और भी खास बनाते हैं। भोजपुर भोजपुर मंदिर, जिसे भोजेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित एक अधूरा शिव मंदिर है। यह मंदिर 11वीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा बनवाया गया था और भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर का मुख्य आकर्षण यहाँ का विशाल शिवलिंग है, जो एक ही पत्थर से बना है और 7.5 फीट ऊंचा है। भोजेश्वर मन्दिर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित भोजपुर गांव में भोजेश्वर मंदिर बना है। इसे भोजपुर मंदिर भी कहा जाता है। रायसेन जिले में स्थित ये एक अधूरा भगवान शिव का मंदिर है। कहते हैं कि इस मंदिर को 11वीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा बनवाया गया था। जो भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर का मुख्य आकर्षण भगवान शिव की विशाल शिवलिंग है। आपको बता दें कि, ये एक ही पत्थर से बना है। जो लगभग 18 फीट ऊंचा और 7.5 फीट चौड़ा है। रायसेन किला रायसेन शहर की ऊंची पहाड़ी पर स्थित रायसेन किला मध्यकालीन भारत की शौर्यगाथाओं का प्रतीक है। इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो यह किला रणनीतिक दृष्टि से बेहद मजबूत माना जाता था। इस किले को जीतने के लिए शेरशाह सूरी ने कई बार आक्रमण किया था। अगर आपको इतिहास में इंटरेस्ट है तो ये जगह आपको बहुत पसंद आएगी। क्योंकि इस किले में आज भी कई बावड़ियां, इत्र महल, बादल महल और रानी महल जैसे प्रमुख हिस्से मौजूद हैं। जिसमें आप पुराने निशान देख सकते हैं।
बेगमों के ख्वाब से बनी भोपाल की मोती मस्जिद

मध्य प्रदेश का भोपाल शहर, वैसे से अपनी खूबसूरती के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन इस शहर में छिपी हुई एक ऐसी ऐतिहासिक धरोहर है। जिसे देखने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं। और देखकर इसकी खूबसूरती और इसके पीछे की कहानी में खो जाए। दरअसल, हम बात कर रहे हैं मोती मस्जिद की, जो सिर्फ अपनी शानदार वास्तुकला के लिए ही नहीं बल्कि इसके बनने की दास्तान भी उतनी ही खास है। आइए जानते हैं भोपाल में छिपी इस खूबसूरती ऐतिहासिक धरोहर के बारे में। कहां से हुई शुरुआत ? आज से करीब 150 साल पहले इस मस्जिद की नींव रखी गई थी। लेकिन इसे बनाने का ये कोई साधारण निर्माण नहीं था। इस मस्जिद को बनाने में तीन पीढ़ियों की महिलाओं का योगदान रहा है। सबसे पहले इस खूबसूरत ख्वाब को गौहर कुदसिया बेगम ने देखा था। जो भोपाल की पहली महिला शासक थीं। इसके बाद उनकी बेटी सिकंदर जहां बेगम ने इस सपने को आगे बढ़ाया और इस मस्जिद बनवाने की पहल की। हालांकि, सिकंदर बेगम इसे अपने जीवनकाल में पूरा नहीं कर सकीं। लेकिन उनकी बेटी शाहजहां बेगम ने मां और नानी के इस अधूरे ख्वाब को हकीकत में बदल दिया। इस तरह से भोपाल में बनी मोती मस्जिद के निर्माण में तीन मां-बेटियों की मिलकर की गई कोशिशें शामिल रहीं। शायद यही कारण है कि ये मस्जिद केवल एक इमारत नहीं, बल्कि उन महिलाओं के खुले विचारों, दूरदर्शिता और धार्मिक भावना की प्रतीक बन गई है। ऐसे हुई मस्जिद की बनावट अगर हम मस्जिद की बनावट की बात करें तो उसकी एक एक चीज पर गहरा काम किया गया। इसे ऊंचे चबूतरे पर लाल पत्थरों से बनाया गया है। सामने तीन दरवाजे हैं और अंदर वुज़ू के लिए दो हौज बने हुए हैं। इसकी सबसे अच्छी बात यह है कि इसका वास्तुशिल्प दिल्ली की जामा मस्जिद से मिलता-जुलता है। लेकिन आकार में यह उससे छोटी है। जब आप मोती मस्जिद को देखेंगे तो इसकी चमक आपको सच में मोती की याद दिला देगी। एक दम चमचमाता हुआ। जैसे सूरज की रोशनी किसी बहती हुई नदी पड़ती है। ठीक इसी तरह शहर के बीचों बीच स्थित मोती मस्जिद दूर से नजर आती है। आपको बता दें कि, ये पूरी मस्जिद सफेद संगमरमर से बनी है। जो धूप में चमकती है और शायद इसी वजह से इसका नाम ‘मोती मस्जिद’ पड़ा। इतना ही नहीं इसके गहरे लाल रंग के मीनारें और सुनहरे बुर्ज इसकी सुंदरता को और भी निखार देते हैं। यहां घूमने दूर दूर से लोग पहुंचते हैं। सालों बाद आज भी हजारों की संख्या में लोग इस मस्जिद को देखने के लिए आते हैं। न सिर्फ एक धार्मिक स्थल के रूप में, बल्कि एक अद्भुत ऐतिहासिक और स्थापत्य कला के उदाहरण के रूप में भी लोग इसे देखते हैं। ये सिर्फ पत्थरों से बनी इमारत नहीं है, बल्कि एक कहानी है जिसके कई किस्से हैं। जिसे देखने और जानने लोग आते हैं। इतना ही नहीं इसमें उन महिलाओं की भी कहानी छुपी है जिन्होंने अपने ख्वाबों को हकीकत में बदला।
बैतूल की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत

मध्य प्रदेश का बैतूल न केवल अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है बल्कि धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के कारण भी इसकी एक खास पहचान है। सतपुड़ा की पर्वत श्रृंखला में स्थित यह जिला जैन तीर्थ मुक्तागिरी, बालाजीपुरम मंदिर, सालबर्डी शिवगुफा और कुकरू जैसी ऊंची पहाड़ियों के लिए प्रसिद्ध है। यहां की शांति, हरियाली, प्राचीन मंदिर और जनजातीय संस्कृति देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। साथ ही, बैतूल जिला भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका है। इस जिले में कई जगह घूमने लायक हैं। तो आइए जानते हैं जिले की खास जगह के बारे में। बालाजीपुरम मंदिर बैतूल से सिर्फ 7 किमी दूर राष्ट्रीय राजमार्ग-69 पर स्थित यह भव्य मंदिर है। जो भगवान बालाजी को समर्पित है। यहां रामायण प्रसंगों पर आधारित मूर्तियां भी बनी हुई हैं। वैष्णो देवी मंदिर, मानव निर्मित झरना और मंदाकिनी नदी जैसे आकर्षण इसे एक खास तीर्थ स्थल बनाते हैं। इसके साथ ही यहां हर साल वसंत पंचमी पर विशाल मेला लगता है। ताप्ती उद्गम (मुलताई) मुलताई मां ताप्ती नदी का उद्गम स्थल है। यह मंदिर स्कंद पुराण में वर्णित है। आपको बता दें कि, इसे धार्मिक रूप से अत्यंत पवित्र माना जाता है। ताप्ती को सूर्य की पुत्री और शनि की बहन कहा गया है, जिससे शनि दोष से मुक्ति मिलती है। यह नदी 724 किमी लंबी है और सूरत से होकर अरब सागर में गिरती है। सालबर्डी शिवगुफा ये गुफा प्रभातपट्टन विकासखंड के सालबर्डी गांव में स्थित है। यह प्राचीन गुफा भगवान शिव को समर्पित है। यहां का शिवलिंग प्राकृतिक जलधारा से निरंतर अभिषेकित होता है। शिवरात्रि पर यहां एक सप्ताह तक चलने वाला विशाल मेला लगता है। जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। कहा जाता है कि यह गुफा पचमढ़ी तक जाती है। कुकरू कुकरू बैतूल जिले की सबसे ऊंची चोटी है। जो 1137 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थल प्राकृतिक सुंदरता, शानदार सूर्यास्त के दृश्य और घने जंगलों से घिरा हुआ है। यह क्षेत्र कोरकू जनजाति का निवास स्थान भी है। मुक्तागिरी जैन तीर्थ भैंसदेही विकासखंड में स्थित मुक्तागिरी, सतपुड़ा के जंगलों में बसा हुआ है और दिगंबर जैन संप्रदाय के 52 मंदिरों का केंद्र है। यह जगह धार्मिक शांति, प्राचीन वास्तुकला और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए जाना जाता है। यह स्थान जिला मुख्यालय से लगभग 102 किमी दूर है। बैतूल के प्रसिद्ध हस्तशिल्प बैतूल जिले की पहचान जरी- जरदोजी और ढोकरा शिल्प जैसे पारंपरिक हस्तशिल्पों से भी जुड़ी हुई है। यहां के जनजातीय कारीगर सदियों से इन कलाओं को सहेजते आ रहे हैं। आप यहां अगर आते हैं तो आपको सालों पुराना इतिहास देखने को मिलेगा। बैतूल की ऐतिहासिक विरासत बैतूल ब्रिटिश शासन के खिलाफ आदिवासी जागरूकता के लिए जाना जाता है। बंजारीदल गांव के शहीद विष्णु सिंह गोंड जैसे स्वतंत्रता सेनानी और नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने वाले 50 से अधिक स्वयंसेवक जिले के गौरव को दर्शाते हैं। बैतूल आने का सबसे अच्छा समय यहां घूमने का सबसे उत्तम समय अक्टूबर से मार्च और मानसून में जुलाई से सितंबर का माना जाता है। इस दौरान मौसम सुहावना होता है और प्राकृतिक सुंदरता अपने चरम पर होती है। बैतूल कैसे पहुंचें? इतना सब जानने के बाद आप सोच रहे होंगे कि आखिर बैतूल कैसे पहुंचे? तो हम आपको बता देते हैं। यहां आने के लिए आप हवाई मार्ग से निकटतम हवाई अड्डा नागपुर (180 किमी) और भोपाल (190 किमी) है। जहां से आप रेल मार्ग या तो सड़क मार्ग से यहां आ सकते हैं।
नर्मदापुरम में क्या खास

पवित्र नर्मदा की गोद में बसा मध्य प्रदेश का नर्मदापुरम एक अद्भुत पर्यटन स्थल है। जहां आपको संस्कृति, प्रकृति और आध्यात्मिकता एक साथ देखने को मिलती है। नर्मदापुरम जिसे पहले होशंगाबाद के नाम से जाना जाता था। ये मध्य प्रदेश का एक ऐसा जिला है जिसे भारत में बेहद समृद्ध और सुंदर पर्यटन स्थलों में गिना जा सकता है। पवित्र नर्मदा नदी के तट पर बसा यह क्षेत्र विरासत, अध्यात्म, प्रकृति और ग्रामीण सौंदर्य का संगम है। यहां का हर कोना कोई न कोई कहानी कहता है। सदियों पुराने मंदिरों से लेकर शांत झीलों, घने जंगलों और जनजातीय संस्कृति तक आपको इतिहास की झलक दिखेगी। वहीं अगर आप इतिहास प्रेमी हैं, प्रकृति पसंद हैं या सुकून ढूंढ रहे हैं तो नर्मदापुरम आपके लिए एक बेहतर स्थान है। अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या खास है तो आइए हम आपको बताते हैं। तवा बांध तवा बांध और इसका जलाशय सतपुड़ा की गोद में बसे हुए प्राकृतिक सौंदर्य और वन्यजीवन का एक अद्भुत केंद्र हैं। बारिश के मौसम में यह क्षेत्र पर्यटकों के लिए बेहद लोकप्रिय हो जाता है। भोपाल से लगभग ढाई घंटे की यात्रा करके आप तवा बांध आ सकते हैं। इतना ही नहीं यहां की क्रूज राइड आपको एक अनोखा अनुभव प्रदान करती है। जलाशय के बीच फैले छोटे-छोटे द्वीपों, सतपुड़ा और चूरना की पहाड़ियों के बीच एक घंटे की शांति से भरी सैर, यहां के नजारे किसी सपने से कम नहीं लगते। अगर आप अब तक यहां घूमने नहीं आए तो एक बार जरूर आइए। आपको एक अलग अनुभव होगा। भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच आपको सुकून मिलेगा। तवा बांध तक कैसे पहुंचे? यहां आने के लिए सबसे पास एयरपोर्ट भोपाल का राजा भोज हवाई अड्डा है। जो नर्मदापुरम से लगभग 70 किमी और तवा से 120 किमी दूर है। यहां से दिल्ली, मुंबई सहित 11 प्रमुख शहरों के लिए हर दिन उड़ानें रहती हैं। ऐसे में आप कहीं से भी आ सकते हैं। भोपाल आने के बाद तवा के लिए टैक्सी सेवा भी आसानी से मिल जाती है। जिससे आप आराम से यहां तक पहुंच सकते हैं। मढ़ई तवा बांध के बाद अब बात आती है मढ़ई की। जो सतपुड़ा बायोस्फीयर रिजर्व का प्रवेश गेट है। यह क्षेत्र अपने घने जंगलों, घास के मैदानों, बैकवाटर और वन्यजीवों के लिए सिर्फ MP ही नहीं बल्कि देश भर में जाना जाता है। यहां आप जंगल सफारी कर बाघ, तेंदुआ, सांभर, पक्षियों और अन्य दुर्लभ प्रजातियों को देख सकते हैं। अगर आप मढ़ई आना चाहते हैं तो आप कार से आ सकते हैं। इसके लिए आप ट्रेन या कार से नर्मदापुरम पहुंचे। वहां से मढ़ई के लिए बस या गाड़ी से आए। यहां ठहरने के लिए आपको कई रिजॉर्ट मिल जाएंगे। इतना ही नहीं यहां का खाना भी आपको बेहतर मिलेगा। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान सतपुड़ा नेशनल पार्क जंगलों से घिरा हुआ है। यह पार्क पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व का कोर जोन है। जो लगभग 4,926 वर्ग किमी में फैला है। यहां सुबह हर दिन जंगल सफारी के साथ-साथ रात की जंगल सफारी भी कर सकते हैं। यह अनुभव आपको तेंदुआ, नीलगाय, उड़ने वाली गिलहरी, विशाल भारतीय गिलहरी जैसे कई वन्य जीवों के साथ-साथ साल, सागौन, बांस और अन्य औषधीय पौधों से भरपूर वनस्पतियों की दुनिया में ले जाएगा। अब अगर आपके दिमाग में ये आ रहा है कि रहने के लिए क्या खास है? तो यहां आपको कई रिजॉर्ट और होटल मिल जाएंगे। इसके साथ ही आप चाहें तो एमपीटी सतपुड़ा रिट्रीट में बुकिंग कर सकते हैं, जो औपनिवेशिक वास्तुकला वाली एक खूबसूरत हेरिटेज प्रॉपर्टी है और पचमढ़ी की सबसे बेहतरीन जगहों में से एक मानी जाती है।
राजगढ़ की ऐतिहासिक: 16 खंभों वाली इमारत
मध्य प्रदेश के राजगढ़ में कई जगह देखने और जानने वाली है। अगर इसके इतिहास की बात करें तो सन 1948 में राजगढ़ जिला बना था। वैसे तो इस जिले के कई धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व हैं। लेकिन आज हम आपको 16 खंभों वाली इमारत के बारे में बताएंगे। राजगढ़ जिले में स्थित नरसिंहगढ़ को ‘मालवा का कश्मीर’ कहा जाता है। इसे यूंही ऐसा नहीं कहते हैं ये क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के लिए भी जाना जाता है। नरसिंहगढ़ से लगभग 10 किलोमीटर दूर कोठरा विहार नाम का एक गांव है। जहां एक अनोखी और रहस्यमयी इमारत है। इस इमारत का नाम ’16 खंभों वाली इमारत है‘। नाम सुन कर आप सोच रहे हैं होंगे की इसके 16 खंभे होंगे इसलिए उसे ये नाम दिया गया है। लेकिन आप को बता दें कि, यह जगह के पीछे कई ऐतिहासिक घटनाएं छिपी हुई है। जो इसे खास बनाती हैं। परमार काल की धरोहर जानकारी के अनुसार, यह इमारत 10वीं से 11वीं शताब्दी के बीच परमार वंश के शासकों द्वारा बनवाई गई थी। ये इमारत 16×16 यानी कुल 256 खंभों पर आधारित है। जसकी वजह से इसे 16 खंभी कहा जाता है। आपको बता दें कि, यह राजगढ़ जिले की प्रमुख ऐतिहासिक संरचनाओं में से एक मानी जाती है। ये है इमारत की सबसे चर्चित कहानी अगर हम इस इमारत की सबसे चर्चित कहानी की बात करें तक वो 16वीं शताब्दी की है। जब यहां राजा श्याम सिंह का शासन हुआ करता था। लोककथाओं की माने तो, इस इमारत के अंदर बारूद जलाया जाता था। जिससे जो आग का गोला या ‘तारा’ उठता था, वह इतना तेज और विशाल होता था कि दिल्ली तक दिखाई देता था। इस समय दिल्ली पर मुगलों का शासन हुआ करता था। जब मुगल बादशाह ने इस ‘आग के तारे’ को देखा, तो वह चौंक गए और जानना चाहा कि आखिर ऐसा कौन-सा राजा है, जिसकी शक्ति का संकेत दिल्ली तक पहुंच रहा है। फिर क्या था, बादशाह ने जानने के लिए तुरंत एक बड़ी फौज तैयार कर डाली। और राजगढ़ की ओर कूच कर दिया। इस दौरान राजा श्याम सिंह ने बहादुरी से मुगल सेना का सामना किया, लेकिन सैनिक की संख्या और शक्ति अधिक होने के कारण उनकी सेना हार गई। इसके बाद मुगल सैनिकों ने इस ऐतिहासिक इमारत को क्षतिग्रस्त कर दिया। बाद में इस स्मारक को पुरातत्व विभाग ने अपने संरक्षण में ले लिया और इसे संरक्षित घोषित कर दिया गया। खतरे में है ये धरोहर आज भी यह इमारत पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। लेकिन संरक्षण की कमी और स्थानीय असामाजिक तत्वों की वजह से इसकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इमारत की दीवारों और खंभों में तोड़फोड़ की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं। यहां तक कि स्मारक के भीतर भी छेड़छाड़ की जा चुकी है। सिर्फ पर्यटन नहीं, विरासत का प्रतीक है 16 खंभी खूबसूरत वादियों के बीच स्थित यह ऐतिहासिक स्थल केवल एक पर्यटक स्थल नहीं, बल्कि एक जीवंत इतिहास है। ये इमारत उस शौर्यगाथा का गवाह है जहां राजा श्याम सिंह ने अपनी मिट्टी और विरासत की रक्षा के लिए मुगल साम्राज्य से लोहा लिया था। यह इमारत आज भी आने वाले पर्यटकों को उस स्वाभिमान, गौरव और बलिदान की कहानी सुनाती है। अगर आप अब तक यहां नहीं गए हैं तो एक बार जरूर जाइए।
हरदा की ऐतिहासिक विरासत

मध्य प्रदेश का हरदा जिला नर्मदा नदी की घाटी में बसा है। ये अपनी जनजातीय संस्कृति, ऐतिहासिक विरासत और हरियाली के किए जाना जाता है। इतना ही नहीं हरदा जिले की पहचान घने सागौन के जंगलों, समृद्ध आदिवासी संस्कृति और ऐतिहासिक स्थलों से जुड़ी है। जानकारी के लिए बता दें कि, 6 जुलाई 1998 को हरदा नर्मदापुरम जिले से अलग हुआ। इसके बाद से ही अस्तित्व में आए हरदा जिले का ऐतिहासिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है। ये जिला समुद्र तल से 302 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और मध्य प्रदेश के दक्षिण-पश्चिमी भाग में नर्मदापुरम संभाग के अंतर्गत आता है। यह क्षेत्र कोरकू और गोंड आदिवासियों से आबाद है, जो इसकी कुल जनसंख्या का दो-तिहाई हिस्सा हैं। आइए अब जानते हैं इसके ऐतिहासिक स्थल और धार्मिक पर्यटन के बारे में ऐतिहासिक स्थल हरदा में कई ऐतिहासिक जगह हैं। जो पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इनमें हंडिया का प्राचीन रिद्धनाथ मंदिर, जोगा का किला, मकडाई मंदिर और चरुआ का चक्रव्यूह मंदिर प्रमुख हैं। साथ ही रेणुका जी मंदिर, सिद्धनाथ मंदिर, खेत वाली माता मंदिर और नेमावाड़ का सूर्य कुंड यहां के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हैं। ट्रैकिंग और प्राकृतिक पर्यटन जिले की हरियाली, बारिश और जलवायु इसे ट्रैकिंग प्रेमियों के लिए भी एक यादगार सफर बनाती है। मकरई ट्रैकिंग के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। जहां पर्यटकों के लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। यहां एक साल में औसतन 916 मिलीमीटर बारिश होती है। वहीं गर्मियों में तापमान 48°C और सर्दियों में 6°C तक जाता है। जनजातीय संस्कृति की झलक आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में जनजातीय जीवन की झलक साफ देखी जा सकती है। सांस्कृतिक और सामाजिक अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं के लिए यह जिला एक उपयोगी गंतव्य माना जाता है। मुगल, मराठा और अंग्रेजी शासन हरदा का इतिहास काफी पुराना है। मुगल काल में हंडिया और महमूदाबाद को मिलाकर हरदा का गठन हुआ था। 1742 में मराठा पेशवा बालाजी बाजीराव के नेतृत्व में इस क्षेत्र पर मराठों ने कब्जा कर लिया था। बाद में यह क्षेत्र सिंधिया रियासत का हिस्सा बना और पिंडारियों व कोरकू आदिवासियों के हमलों का गवाह बना। इसका इतिहास यहीं खत्म नहीं होता। सन 1817 में तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बीच हरदा ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आया। फिर क्या था ये जिला 1844 में अंग्रेजों को पूरी तरह सौंप दिया गया। परिवहन की बेहतर सुविधा राजधानी भोपाल से 168 किमी दूर स्थित हरदा सड़क और रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। अगर आप यहां आना चाहते हैं तक नजदीकी हवाई अड्डा भोपाल में है। जबकि इंदौर और जबलपुर एयरपोर्ट से भी यहां पहुंचा जा सकता है। जिले के तीनों ब्लॉक हरदा, खिरकिया और टिमरनी भी सड़क और रेल से जुड़े हैं। जिससे आप ट्रेन के माध्यम से भी यहां तक पहुंच सकते हैं। जानकारी के लिए आपको बता दें कि, हरदा न केवल अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के लिए बल्कि आदिवासी जीवन, हरियाली और धार्मिक पर्यटन के लिहाज से भी मध्य प्रदेश के एक अनमोल रत्न के रूप में उभर रहा है। यहां पर कई ऐसी जगह हैं जहां आप घूमने के लिए आ सकते हैं।
राजगढ़ जिले के प्रमुख पर्यटन स्थल

मध्य प्रदेश का राजगढ़ जिला एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध क्षेत्र है। अगर आप यहां घूमने का प्लान बना रहे हैं या आप सोच रहे एक ऐसी जगह जहां आपको इतिहास की झलक दिखें, तो ये जगह आपके लिए एक दम परफेक्ट है। अब आप सोच रहे होंगे की ऐसा क्या है यहां? तो आइए हम आपको बताते हैं। राजगढ़ में कई किले, मंदिर, दरगाहें और प्राकृतिक स्थल मौजूद हैं। जो अपने धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं। आइए जानते हैं यहां क्या-क्या खास है। नरसिंहगढ़ किला नरसिंहगढ़ का किला न केवल वास्तुकला की दृष्टि से अद्भुत है, बल्कि यह धार्मिक आस्था और राजपरंपरा का भी प्रतीक रहा है। यह किला भगवान श्री रघुनाथजी यानी भगवान श्रीराम को समर्पित है। यहां के शासक खुद को राज्य का शासक न मानकर केवल भगवान रघुनाथजी का प्रधान सेवक या फिर यूं कहे की खुद को वह मंत्री मानते थे। राज्य का संपूर्ण शासन और अधिकार उन्हीं के नाम पर चलता था। जानकारी के लिए आपको बता दें कि, नरसिंहगढ़ को ‘मालवा का कश्मीर’ भी कहा जाता है। अगर हम इसकी विशेषता के बारे में बात करें तो किले में 4 बड़ी दीवारें, 12 चौक, 64 बरामदे और 304 कमरे हैं। इस किले का निर्माण आज से लगभग 300 साल पहले हुआ था। जालपा माता मंदिर जालपा माता मंदिर राजगढ़ जिले में स्थित है। ये एक ऐसा पवित्र स्थल है, जो अपनी अनोखी मान्यता और चमत्कारी शक्तियों के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि जिन युवक या फिर युवती की शादी में अड़चनें आ रही हों या जिनकी कुंडली में विवाह का शुभ मुहूर्त नहीं निकल रहा हो, उनके लिए मां जालपा स्वयं मार्ग निकाल देती हैं। यहां कर दूर दूर से लोग आते हैं। भक्तों का मानना है कि मां जालपा की कृपा से वह विवाह भी संभव हो जाता है, जो सालों से रुका हो या फिर बार बार टल रहा हो। यही कारण है कि देशभर से ऐसे कई जोड़े यहां दर्शन के लिए आते हैं, जिनकी शादी में रुकावटें आ रही होती हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं कि जिनकी शादी में दिक्कत आए वही दर्शन कर सकते हैं। आप भी यहां आ सकते हैं अपने परिवार और दोस्तों के साथ। यहां आकर आपको अनोखा अनुभव होगा। ये मंदिर राजगढ़ शहर की पहाड़ी पर स्थित है। अगर इसके इतिहास की बात करे तो ये मंदिर लगभग 550 वर्ष पुराना है। जिसे भील राजाओं के समय से पूजा की जा रही है। दरगाह शरीफ अगर आपका दरगाह जाने का मन हो तो आप दरगाह शरीफ राजगढ़ घूमने जा सकते हैं। इस दरगाह को बाबा बदख्शानी भी कहा जाता है। ये मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में स्थित एक प्रसिद्ध सूफी दरगाह है। यह दरगाह हज़रत शाह सैयद क़ुरबान अली शाह बदख्शानी रहमतुल्लाह अलैह की याद में बनाई गई है। जो एक महान सूफी संत और पीर (गुरु) थे। इस दरगाह का निर्माण 1914 में हुआ था। अगर इसके महत्व के बारे में बात की जाए तो यह दरगाह हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। जहां हर धर्म के लोग आस्था से आते हैं। ये सभी जगह ऐसी हैं जहां आप अपने परिवार या दोस्त के साथ घूमने जा सकते हैं। ये आपको इतिहास से जोड़ेगी। इसके साथ ही इसके पीछे छुपी कई कहानी बताइए।
विदिशा का ऐतिहासिक कहानी

मध्य प्रदेश का विदिशा जिला अपने अनूठे ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए देश भर में जाना जाता है। राजधानी भोपाल से महज 56 किलोमीटर दूर स्थित यह शहर भारत के प्राचीन नगरों में से एक है, जिसकी पहचान हजारों वर्षों से इतिहास, पुरातत्व और धर्म से जुड़ी हुई है। जो कभी रोमांचित है। आइए जानते हैं आखिर क्या कुछ खास है। इतिहास में विदिशा की जगह विदिशा मामूली जिला नहीं बल्कि इसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण और ब्रह्मपुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। इसका पुराना नाम भद्रावती था। इतना ही नहीं इसे कभी भिलसा के नाम से भी जाना जाता था। 1956 में इसे उसके ऐतिहासिक गौरव को देखते हुए ‘विदिशा’ नाम दिया गया। ऐतिहासिक कथाओं के अनुसार, वैदिक काल में आर्य देवी ने यहां महिष नामक असुर को पराजित किया था, इसलिए आज भी यहां कुछ समुदाय महिषासुर की पूजा करते हैं। यही नहीं, विदिशा का संबंध सम्राट अशोक से भी रहा है। कहा जाता है कि लगभग 2600 वर्ष पहले, अशोक यहां के गवर्नर थे। इतना ही नहीं विदिशा व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र रहा करता था। आज भी यहां की खंडहरनुमा इमारतें और प्राचीन अवशेष इस क्षेत्र की समृद्ध विरासत को दर्शाते हैं। जिसे देखने के लिए दूर दूर से लोग पहुंचते हैं। धार्मिक और पर्यटन स्थल विदिशा में कई धार्मिक और पुरातात्विक स्थल हैं, जो इतिहास प्रेमियों और श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास हैं। आइए जानते हैं यहां पर घूमने लायक क्या है, जहां आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ आ सकते हैं। उदयगिरी की गुफाएं विदिशा से मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर उदयगिरी की गुफाएं है। जिसे एक पहाड़ी को काटकर बनाई गई हैं। यह जगह भगवान विष्णु के वराह अवतार के लिए प्रसिद्ध है। गुफाओं में विष्णु को सूअर के सिर वाले रूप में देखा जा सकता है। यहां लगभग 20 गुफाएं हैं। जो गुप्तकालीन शिल्पकला और धार्मिक आस्था को दर्शाती हैं। नीलकंठेश्वर मंदिर विदिशा में नीलकंठेश्वर मंदिर है। यह प्राचीन शिव मंदिर है। जिसे 11वीं सदी में परमारा राजा उदयादित्य द्वारा बनवाया गया था। इसके शिलालेखों से पता चलता है कि यह मंदिर 1059 से 1080 ई. के बीच बनाया गया हो। इसकी वास्तुकला उस काल की धार्मिक आस्था और स्थापत्य कला का उदाहरण है। यहां देश भर लोग आते हैं। खासकर सावन के महीने में यहां भक्तों का तांता लगता है। गिरधारीलाल मंदिर जिले में भगवान विष्णु का गिरधारीलाल मंदिर है। जिसे 16वीं सदी में चंदेल राजवंश ने बनवाया था। मंदिर की शिल्पकला और धार्मिक महत्व इसे विदिशा का प्रमुख स्थल बनाते हैं। यहां आप अपने परिवार के साथ घूमने आ सकेंगे है। कहते हैं यहां आकर मन को शांति मिलती है। लोहांगी पहाड़ लोहांगी पहाड़ विदिशा शहर के बीचों-बीच स्थित है। जो ऊंची पहाड़ी अपने प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक महत्व के लिए जानी जाती है। यहां से पूरे विदिशा शहर का खूबसूरत दृश्य देखने को मिलता है। जो हर पर्यटक को आकर्षित करता है। इस पहाड़ की चोटी से जब आप चारों ओर नजर डालते हैं, तो विदिशा का सुंदर नजारा आपकी आंखों के सामने बिखर जाता है। दूर-दूर तक फैली बेतवा नदी, उसके किनारे लगी हरी-भरी वृक्षों की श्रृंखला, रायसेन का किला, सांची की पहाड़ियां और उदयगिरि की गुफाएं यहां से एक दम साफ दिखाई देता है। इतना ही नहीं यहां से शहर के छोटे-छोटे घर, रेलवे स्टेशन और आसपास के इलाके भी बेहद सुंदर दिखाई देते हैं। खासकर सूर्यास्त के समय का दृश्य काफी मनमोहक होता है। जब आसमान रंग-बिरंगे रंगों से भर जाता है।
भोपाल में घूमने लायक ये हैं टॉप पर्यटन स्थल

मध्यप्रदेश को भारत का दिल कहा जाता है। ये नाम यूंही नहीं पड़ा। इसके पीछे की कई वजह है। सबसे बड़ी वजह यह भौगोलिक रूप से देश के केंद्र में बसा हुआ राज्य है। इसके साथ ही यहां कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थल है। जिसे देखने दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। वहीं मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को झीलों का शहर कहा जाता है। ये शहर प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक स्मारक और स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए प्रसिद्ध है। ये शहर देगा खूबसूरत यादें अगर आप यहां घूमने का प्लान बना रहे हैं तो सोचिए नहीं, क्योंकि ये शहर आपको अंत में एक खूबसूरत यादों की पोटली देगा। जिसकी ट्रिप आपको हमेशा याद रहेगी। यहां आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ आ सकते हैं। यहां घूमने के लिए कई जगह हैं, लेकिन जो सबसे खास है वो हम आपको बताते हैं। भोपाल में क्या है खास भोपाल को झीलों की नगरी कहा जाता है। क्योंकि यहां एक बड़ा तालाब और एक छोटा तालाब है। जो सिर्फ प्रदेश में ही नहीं बल्कि देशभर में मशहूर हैं। लेकिन इस शहर में सिर्फ झीलें ही नहीं, भोपाल में कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थल भी हैं। जो इसे एक परफेक्ट टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाते हैं। आइए जानते हैं यहां की खास जगहों के बारे में… बड़ा तालाब भोपाल का सबसे प्रसिद्ध स्थान बड़ा तालाब है। इसे भोजताल भी कहा जाता है। जो भारत की सबसे पुरानी मानव निर्मित झीलों में से एक है। इसका निर्माण राजा भोज ने करवाया था। इस झील के किनारे पर कमला पार्क बसा हुआ है। जो इसे और भी खूबसूरत बनाता है। आप यहां अपने दोस्त और परिवार के साथ घूम सकते हैं। वन विहार राष्ट्रीय उद्यान बड़ा तालाब के पास ही स्थित यह राष्ट्रीय उद्यान प्रकृति प्रेमियों और वाइल्डलाइफ लवर्स के लिए एक शानदार जगह है। यहां आपको ब्लैकबक, सांभर, नीला बैल, चीतल, साही जैसे जानवर देखने को मिलते हैं। इतना ही नहीं यहां आप सुबह जाकर साइकिल से भी घूम सकते हैं। पर ध्यान दें ये पार्क मंगलवार को बंद रहता है। यहां का प्रवेश शुल्क भारतीयों के लिए 15 और विदेशियों के लिए 200 है। सांची स्तूप राजधानी भोपाल से बस कुछ ही दूरी कर सांची स्तूप है। जो सम्राट अशोक के काल का है। यह देश के सबसे प्रमुख बौद्ध स्मारकों में गिना जाता है। बताया जाता है कि, यहां बुद्ध के अवशेषों को संरक्षित किया गया है। सांची स्तूप सुबह 8:30 बजे खुलता है और शाम 6:00 बजे बंद हो जाता है। यहां भी आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ घूमने के लिए आ सकते हैं। https://abdulbreaking.com/2025/08/16/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%86%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%9a-%e0%a4%95/ भीमबेटका गुफाएं अगर आपको पहाड़ों के बीच में घूमने का मन है तो आप भीमबेटका गुफा की ओर जा सकते हैं। ये भोपाल से सिर्फ 45 किमी दूर ही स्थित है। आपको बता दें कि इन प्राचीन गुफाओं को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया है। ये गुफाएं 30,000 साल पुरानी हैं। जिसे पूर्व-ऐतिहासिक चित्रकला का अद्भुत नमूना कहा जाता है। ये जगह घने जंगलों के बीच स्थित हैं। यहां आप हर मौसम में जा सकते हैं। मोती मस्जिद राजधानी को नवाबों का शहर भी कहा जाता है। यहां मोती मस्जिद भी है। जिसे देखने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं। इस मस्जिद को सन 1844 से 1868 में सिकंदर जहां बेगम ने बनवाई थी। यह मस्जिद सफेद संगमरमर से बनी है। जो दिल्ली की जामा मस्जिद से मिलती-जुलती है। जानकारी के लिए आपको बता दें कि, इसे ‘पर्ल मस्जिद’ भी कहा जाता है। इतिहास प्रेमियों के लिए यह एक अद्भुत स्थल है। बता दें कि यह मस्जिद भारतीय मुस्लिम महिलाओं के इतिहास में खास है। क्योंकि इस मस्जिद के निर्माण का आदेश महिला मुस्लिम शासक सिकंदर बेगम ने दिया था। सिकंदर बेगम एक पढ़ी-लिखी महिला थीं। अगर इसके नाम की बात करें तो ये देखने में एक मोती की तरह चमकती है। जिसके कारण इसका नाम मोती मस्जिद रखा गया।