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भोपाल की वीरांगना रानी कमलापति की कहानी

वीरांगना रानी कमलापति

जब भी मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के इतिहास का जिक्र होता है, उसमें कई किरदास याद आ जाते हैं। लेकिन इसमें एक किरदार ऐसा भी है जिसे आज तक याद किया जाता है। छोटे से लेकर बड़े तक के मुंह पर उनका नाम है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं ‘रानी कमलापति’ की। जब भी भोपाल के गौरवशाली अतीत की बात सामने आती  है, तो रानी कमलापति का नाम सम्मान से लिया जाता है। रानी कमलापति न सिर्फ सौंदर्य की प्रतीक थीं, बल्कि साहस, आत्मबलिदान और रणनीतिक की मिसाल भी बनीं। मध्यप्रदेश की माटी में उनका जीवन, प्रेम, संघर्ष और बलिदान एक छाप छोड़ गया है। 

 

गोंड वंश से था रानी कमलापति का संबंध

मध्यप्रदेश में सदियों से प्रभावशाली रहे गोंड वंश से रानी कमलापति का संबंध था। उनका विवाह गिन्नौरगढ़ के शक्तिशाली गोंड राजा निजाम शाह से हुआ था। गिन्नौरगढ़  भोपाल से लगभग 55 किलोमीटर दूर स्थित है। आपको बता दें कि 750 गांवों को मिलाकर बना ये एक विशाल राज था। जहां राजा निजाम शाह निडर, वीर और प्रजावत्सल शासक थे। बताया जाता है कि रानी कमलापति उनकी सबसे प्रिय रानी थीं।

 

राजा निजाम शाह की थी सात पत्नियां  

वैसे तो राजा निजाम शाह की सात पत्नियां थीं, लेकिन रानी कमलापति न केवल सुंदर थी, बल्कि राजकीय कार्यों में भी अत्यंत कुशल थीं। बताया जाता है कि वे राज्य की प्रशासन व्यवस्था, जनता की समस्याएं और कई मामलों में भी सक्रिय भूमिका निभाती थीं। जिसके चलते राजा निजाम शाह ने अपनी रानी के प्रति प्रेम और सम्मान दिखाते हुए 1720 में एक भव्य सात मंजिला महल का बनवाया। जो आज भी भोपाल की पहचान है, जिसे हम रानी कमलापति महल कहते हैं। 

 

रानी कमलापति महल

रानी कमलापति महल का निर्माण लाखोरी ईंटों से हुआ था। इसकी बनावट में कमल की पंखुड़ियों जैसी सुंदर कलाकृति देखने को मिलती है। यह महल न सिर्फ वास्तुकला की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि रानी के जीवन की अनेक कहानियों को भी दिखाता है। रानी कमलापति का जीवन तब बदल गया, जब राजा निजाम शाह के भतीजे आलम शाह ने सत्ता की लालसा में अपने ही चाचा की हत्या कर दी। आलम शाह बाड़ी रियासत का शासक था और गिन्नौरगढ़ की समृद्धि और सत्ता पर उसकी नजर थी। उसने षड्यंत्र रच राजा को खाने में विष देकर मार डाला।

 

पति की मौत के बाद टूट गई थी रानी

पति की मौत के बाद रानी को अपने बेटे नवल शाह के साथ जीवन की चिंता सताने लगी। आलम शाह की बुरी नजर अब रानी और उनके पुत्र पर थी। ऐसे में रानी कमलापति अपने बेटे के साथ गिन्नौरगढ़ छोड़कर भोपाल आ गईं और अपने सात मंजिला महल में रहने लगीं। हालांकि, उनके भीतर पति की हत्या का बदला लेने की आग धधक रही थी, पर उनके पास न सेना थी और न धन।

 

इसी दौरान अफगान योद्धा दोस्त मोहम्मद खान जो कभी मुगल सेना का हिस्सा था, भोपाल पर अधिकार की योजना बना रहा था। रानी कमलापति ने उससे सहायता मांगी। दोस्त मोहम्मद ने मदद के बदले एक लाख रुपए की मांग की। रानी ने यह शर्त स्वीकार कर ली, हालांकि उनके पास इतनी बड़ी राशि नहीं थी। लेकिन वे बदला लेना चाहती थीं और इसके लिए हर जोखिम उठाने को तैयार थीं।

 

बताया जाता है कि, रानी की सहायता के बदले दोस्त मोहम्मद ने गिन्नौरगढ़ पर कब्जा कर लिया। इसके बाद रानी के बेटे नवल शाह की भी हत्या कर दी। रानी इस विश्वासघात से टूट गईं। कहते हैं कि दोस्त मोहम्मद के बढ़ते दबाव और धोखे से परेशान होकर रानी कमलापति ने अपने महल से छलांग लगाकर अपने प्राण त्याग दिए। उस समय वहां से कोलांस नदी बहा करती थी।

 

रानी कमलापति की यह गाथा आज भी भोपाल की हवाओं में गूंजती है। उनका महल, जो अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है, इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। 1989 में भारत सरकार ने इस स्मारक को संरक्षित घोषित किया। नवंबर 2021 में रानी कमलापति के अद्भुत योगदान को सम्मान देने के उद्देश्य से भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर रानी कमलापति रेलवे स्टेशन रखा गया। इसके साथ ही भोपाल का कमला पार्क भी उनकी याद में बनाया गया है।

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